अपने स्वार्थ के लिये कितना गिर सकता हैं चिकित्सक

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गीतांजलि पोस्ट ( रेणु शर्मा, जयपुर) चर्चाओं में रहने वाले राजस्थान के सबसे बड़े अस्पताल एसएमएस के कारनामें मरीजों के लिये जानलेवा हो रहे हैं क्योकि यहां के डॅाक्टर मात्र पैसा कमाने के लिये मरीजों को ईलाज करवाने के लिये निजी अस्पताल भेज देते हैं लेकिन अफसोस जब निजी अस्पताल में मरीज का ईलाज नहीं हो पाता तो उसे एसएमएस अस्पताल भेजा जाता हैं जिससे मरीज के साथ-साथ उसके परिजनों को भी परेशानियों का सामना करना पडता हैं, डॉक्टर के इसी उठापटक में मरीज की मौत भी हो जाती हैं।

उल्लेखनिय हैं कि सरकार ने एसएमएस अस्पताल सहित सारे सरकारी अस्पतालों में मरीजों के ईलाज के साथ, मरीज की जांच, दवाई निशुल्क होती हैं लेकिन कुछ सरकारी डॉक्टर मात्र पैसा कमाने के लालच में सरकारी अस्पताल में ईलाज करवाने के लिये आने वाले मरीजों को ईलाज के लिये उस निजी अस्पताल में जाने का कहते हैं जिस निजी अस्पताल में वो डॉक्टर पैसा लेकर मरिजों का ईलाज करता हैं।

जैसा की आप सभी जानते हैं कि सभी निजी अस्पताल में एक्सपर्ट डॉक्टर और ईलाज के लिये सारी सुविधाये नहीं होती इसके कारण वहीं डॉक्टर जो एसएमएस अस्पताल ईलाज करता हैं वो निजी अस्पताल मे ईलाज नहीं कर पाता तो वो उस मरीज को एसएमएस अस्पताल ईलाज के लिये भेजता है।

हॉल ही में भरतपुर से ईलाज के लिये एसएमएस अस्पताल आये मरीज को एसएमएस अस्पताल के सीनियर डॉक्टर जी एस कालरा ने जयपुर के ही जवाहर नगर के जैन अस्पताल जाने के लिये कहां लेकिन जैन अस्पताल मे डॉ कालरा द्वारा किये जा रहे आपरेशन में मरीज की हालत बिगड गयी तो डॉ कालरा उसे वापस एसएमएस अस्पताल भिजवा देते हैं जहंा मरीज की मौत हो जाती हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ इससे पहले भी एसएमएस अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विनोद शर्मा ने अस्पताल में भर्ती एक मरीज को ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल भेज दिया था, निजी अस्पताल में मरीज की तबीयत बिगडऩे पर उसे वापस एसएमएस जाने को कहां, किन्तु उस समय तक मरीज की हालत बिगड गयी और मरीज की मौत हो गई। ऐसे और बहुत मामले सामने आये हैं जिसमें एसएमएस अस्पताल के डॉक्टर मरीजों को अपनी पंसद के निजी अस्पताल में भर्ती करने का कहते हैं लेकिन जब निजी अस्पताल में मरीज की हालत गंभीर हो जाती हैं तो मरीज को वापस एसएमएस अस्पताल भेजा जहां मरीज की मौत हो गयी ।

एसएमएस जैसे सरकारी अस्पताल में ईलाज के लिये आने वाले मरीजों को डॉक्टर निजी हॉस्पिटल में ईलाज करवाने के लिये क्यों कहता हैं ? क्या सरकारी अस्पताल में डॉ अयोग्य हैं या सरकारी अस्पताल में मरिजों के ईलाज के लिये सुविधाये नहीं हैं ? यदी सरकारी अस्पताल में मरिजों के ईलाज के लिये सुविधाये नहीं हैं , सरकारी अस्पताल के डॉ अयोग्य हैं तो जब निजी हॉस्पिटल में मरीज का ईलाज नहीं हो पाता तो मरीज को कर एसएमएस अस्पताल में ईलाज के लिये क्यों भेजता हैं ?

पाठको, मुझे तो इस सारे घटनाक्रम में पैसों का खेल ही दिखाई देता हैं, जब एक सरकारी अस्पताल में ईलाज करवाने के लिये आये मरीज को निजी हॉस्पिटल में जाने के लिये कहता हैं। क्योकि निजी हॉस्पिटल में डॉक्टर को मरीज भेजने का और मरीज का ईलाज करने का मोटा कमीशन मिलता हैं। अनावश्यक जांच और दवाई के नाम पर निजी हस्पताल वाले ईलाज के नाम पर मरीज को लूटते रहते हैं। गौर करने वाली बात हैं कि निजी अस्पताल में ईलाज का पैसा डॉक्टर नकद लेते हैं जिसकी मरीज के परिजनों कोई रसीद भी नहीं देते। खेर जब से निजी अस्पतालों में मरिजों की जांच पर डॉक्टर्स को दिये जाने वाले कमिशन को कम किया हैं उसके बाद तो डॉक्टर मरीजों का चेकअप ही कम करवाने लग गये। साफ हैं सारा तमाशा पैसों का हैं जब जॉच का कमिशन ही नहीं मिलगा तो जॉच करवाने से क्या फयादा।

सोचने वाली बात हैं कि सरकारी अस्पताल में ईलाज के लिये आने वाले मरीजों की कतार लगी रहती हैं, ऐसे में वहां के डॉक्टरों के पास इतना समय कहां से आ गया कि वो निजी अस्पताल में जाकर किसी का ऑपरेशन करे ? निजी अस्पताल में काम करने के चक्कर में डॉक्टर सरकारी अस्पताल के मरीजों को ऑपरेशन केे लिसे अनावश्यक तारिखे देते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर वहीं डॉक्टर निजी अस्पताल में बिना विलम्ब किये ऑपरेशन कर देते हैं। क्योकि सरकारी अस्पताल का डॉक्टर जानता हैं कि वो सरकारी अस्पताल में कैसे भी काम करे या काम नहीं करे उसे उसकी तनख्वाह तो मिलती रहेगी।

दोस्तों, देखा जाये तो चिकित्सा का व्यवसाय बहुत ही सम्मानित और गरिमामय का पैशा हैं, यहां तक की मरीज तो ड़ॉक्टर को अपना भगवान ही मानते हैं और आमजन भी डॉक्टर्स को बहुत मान-सम्मान दिया जाता हैं। अधिकाश चिकित्सकों ने इस पैशे को अपनी सेवा और निष्ठा से इसकी गरिमा को बनाये रखा है लेकिन कुछ स्वार्थी डॉक्टर्स ने पैसों के लालच में इसकी गरिमा खो दी हैं इसके लिये उन्होने बहुत ही घृणित हथकण्ड़े अपनाये हैं, जैसे- कमिशन के लिये मरीज को अनावश्यक दवाईया देना और अनावयश्क जाँच करवाना और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर तो उन्ही मरीजों पर विशेष ध्यान देते हैं एंव उन्हे ही सरकारी सुविधाएं दिलवाते हैं जो डॉक्टर के घर पर जाकर मिलकर उन्हे मोटी फिस हैं। कई बार प्राईवेट अस्पतालों में तो मरणासन्न मरिज को वेटिलेटर पर रख का कर कृत्रिम आक्सीजन देकर रखा जाता हैं, मरिज के मरने के बाद भी जब तक उक्त बिलों की मोटी राशि नहीं मिल जाती तब तक उनके परिजनों को शव भी उठाने नहीं देते। भू्रण परिक्षण जो कानूनन अपराध हैं, फिर भी पैसों के लिये डाक्टर भू्रण परिक्षण करके भूण हत्या जैसे जघ्नय काम करते हैं। इतना ही नहीं कुछ डॉक्टर्स तो पैसों के लिये मरीजों के अंग तक निकाल कर बेच देते हैं। ये कृत्य भगवान के नहीं बल्कि राक्षको के हैं अब तक जिस चिकित्सक को भगवान माना जा रहा था वो अपने ही कामों के कारण राक्षस हो गया। इसी कारण डॉक्टर की छवि एक डाकू जेसी बन गयी और चिकित्सा का व्यवसाय बदनाम हो गया। हालाँकि सभी डॉक्टर ऐसे नहीं होते लेकिन कुछ डॉक्टर ऐसे होते है जिनके कारण पूरा चिकित्सा का व्यवसाय ही बदनाम हो रहा हैं और लेकिन ईमानदारी से अपना काम करने वाले डॉक्टर्स भी इसका शिकार हो रहे हैं।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

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