वीरांगना के जौहर का चीर-हनन

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गीतांजलि पोस्ट……. रेणु शर्मा, जयपुर

अपनी शूटिंग के वक्त से ही से ही विवादों में रहने वाली बॉलिवुड निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। रानी पद्मावती का अलाउद्दीन खिलजी संग प्रेम प्रसंग की कहानी का राजपूत समाज एंव ब्राहमण के अलाव कई भारतीय सामाजिक संगठन, बुद्विजीवी और इतिहासकार विरोध कर रहे हैं। उल्लेखनिय हैं इससे पहले करणी सेना ने फिल्म के सेट पर हंगामा किया था इसके बाद संगठन ने फिल्म दिखाने की मांग की और अब राजपूत संगठनों ने 1 दिसंबर को फिल्म रिलीज के मौके पर चित्तौडगढ़़ बंद का ऐलान कर दिया। जैसे-जैसे फिल्म रिलीज की तारीख नजदीक आ रही हैं विवाद बढता जा रहा हैं। फिल्म के श्रीगणेश होने से लेकर फिल्म बनने के दौरान होने वाले विवादों से यह बात तो स्पष्ट हो गयी है कि इस फिल्म को बनाने के दौरान ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेडछाड की गया हैं। जब किसी ऐतिहासिक तथ्य पर फिल्म बनाते हैं तो उसके फैक्ट को वॉयलेट नहीं कर सकते। रानी पद्मावती की गाथा एक ऐतिहासिक तथ्य है, अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर रानी पद्मावती पर थी और इसके लिए उसने चित्तौड़ को नष्ट कर दिया था। रानी पद्मावती के पति राणा रतन सिंह अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए थे। स्वंय रानी पद्मावती ने हजारों उन स्त्रियों के साथ जिनके पति वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जीवित ही स्वंय को आग के हवाले कर जौहर कर लिया था।

इतिहास गवाह हैं कि हिन्दू धर्म सहिष्णु रहा हैं इसी का फायदा उठा कर भंसाली ने आजादी की अभिव्यक्ति के नाम पर पैसा कमाने के लिये हिन्दू धर्म के ऐतिहासिक विरासत, बलिदान, जौहर पर फिल्म पद्मावती का फिल्मांकन कर लिया। भंसाली को किसने यह अधिकार दिया कि वो रानी पद्मिनी को अलाउदीन खिलजी की प्रेमिका बताकर रानी पद्मिनी का चरित्र- हनन करे ? जिस प्रकार भंसाली ने अपनी फिल्म में रानी पद्मावती चित्राकंन किया हैं वो उस महान वीरांगना , उस सती का अपमान हैं जिसने, अपने पति की वीरगति के बाद सेकड़ों महिलाओं के साथ जौहर किया था, जिसका हमारे इतिहासकारों द्वारा महिमामंडऩ किया जाता रहा हैं । उस बहादुर वीरांगना का भंसाली ने चीर-हनन किया हैं जो क्षमा योग्य नहीं हैं इसे समाज कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। यह एक महिला के साथ-साथ एक सती का भी अपमान है। भंसाली के इस कदम की जितनी निन्दा की जाये, उतनी ही कम है ताकि भविष्य में कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर हमारे इतिहास, हमारे धर्म, हमारे संस्कारों पर टिप्पणी करने की हिम्मत ना जुटा पाये। भंसाली में हिम्मत हैं तो अन्य धर्म के ऐतिहासिक मामलों को लेकर फिल्म बनाये तब मालूम चलेगा की किसी की ऐतिहासिक विरासत के साथ कैसे खिलवाड किया जाता हैं?

यह लड़ाई केवल राजपूत समाज की लड़ाई ही नहीं हैं बल्कि भारतीय मूल्यों का सम्मान करने वाले सभी समाज की लड़ाई है क्योकि महापुरुष और वीरांगनाऐ किसी एक जाति के नही होते अपितु पूरे देश-धर्म की विरासत होते है, यदी कोई भारतीय नारी के सम्मान से खिलवाड़ करता हैं तो उसे समाज कभी माफ नही कर सकता। समाज की भावनाओं को आहत पहुंचाने वाली इस फिल्म के विरोध में केन्द्रिय मंत्री गिर्राज सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती, केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस, दीया कुमारी, रुक्ष्मनी कुमारी सहित राजपूत समाज एंव ब्राहमण के अलाव कई भारतीय सामाजिक संगठन, बुद्विजीवी और इतिहासकार उतर आये हैं, इतना विरोध होने के बावजूद भी फिल्म के प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाने का क्या कारण हो सकता हैं ये सवाल सोचने वाला हैं ?

सेंसर बोर्ड को भी समाज की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय देना चाहिये था कि फिल्म को रिलीज करना चाहिये या नहीं करना चाहिये। लोगों की भावनाओं को आहत करती फिल्म को सेंसर बोर्ड द्वारा प्रदर्शन की अनुमति मिलना भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर सवाल खडा करता हैं कि जब जनता कि भावनाओं को ही ध्यान में नही रखा जाता वहंा क्या लोकतान्त्रिक व्यवस्था का कोई अर्थ नही रहता। फिल्म के विरोध को देखते हुए फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स ने विवाद सुलझने तक राजस्थान में फि़ल्म रिलीज करने से मना कर दिया हैं ।

वहीं दूसरी और अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये एबीपी जैसे न्यूज़ चैनल के एंकर एवं तथाकथित फर्जी इतिहासकार ये सिद्व करने में लगे हैं कि कौन वास्तविक है और कौन काल्पनिक है, वे दिखा रहे हैं रानी पद्मावती के वजूद का वायरल सच , सपना या इतिहास की हकीकत जैसे कार्यक्रम जिससे लगता हैं अब 700 साल पुराने इतिहास को भी अपने होने का प्रमाण देना पडेगा ? लगता हैं ऐसे लोगों ने 700 साल पुराने चित्तोड के इतिहास को नहीं देखा, राणी पद्मावती का जोहर स्थान नहीं देखा जिसकी दिवारों से आज भी चिल्ला-चिल्ला कर जौहर की याद दिलाती हैं, खेर जिसका जितना दिमाग होता हैं वो उतनी ही बात सोचता हैं और वहीं दिखाता हैं, उनके दिखाने का कोई फर्क नही पडता।

क्षत्रिय समाज के साथ-साथ भारतीय परम्परा को मानने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती फिल्म पद्मावती को लेकर जो भी विवाद हैं उन्हे सुलझाया जाना चाहिये जैसा कि फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली कह रहे कि उन्होने ने फिल्मांकन के दौरान ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेडछाड नही की हैं, फिर भी राजपूत समाज के लोग फिल्म का विरोध कर रहे हैं , तो भंसाली को फिल्म को रिलीज से पहले राजपूत प्रतिनिधियों एंव अन्य प्रबुद्व व्यक्तियों को दिखाये जिससे राजपूत समाज सहित पूरे देश को विश्वास हो जाए कि फिल्म के फिल्मांकन के दौरान ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेडछाड नहीं की गयी हैं, उसके बाद ही फिल्म को रिलीज करे।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र