लोकतन्त्र के चौथेस्तम्भ का पोषण जरूरी

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गीतांजलि पोस्ट……. रेणु शर्मा  (जयपुर ) लोकतन्त्र के विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीन प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं, इसमें चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया हैं। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती हैं। देश की आज़ादी के बाद से आज तक मीडिया ये भूमिका निभाता भी रहा है। कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता और सततता के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों। चारों अपना अपना काम पूरी जिम्मेदारी व निष्ठा से करें। विधायिका जहां कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका ये देखती हैं कि सभी को संविधानानुसार न्याय मिले वहीं मीडिया जो तीसरी आंख की तरह हैं वो इन सबके ऊपर नजर रखता हैं, समसामयिक विषयों पर लोगों को जागरुक करता हैं, सरकार के इन तीनों आयामों के क्रिया कलापों के बारे जनता को अवगत करवाता हैं और जनता के विचारों, समस्याओं एंव प्रतिक्रियाओं को सबके समक्ष लाता हैं जिससे कि संबधित विभाग उसकी विवेचना कर उसके बारे में लोकहितार्थ निर्णय लेकर क्रियान्वित कर सके।

यदी लोकतन्त्र को चलाना हैं तो इन चारों स्तम्भों का मजबूत होना आवश्यक हैं। इन चारों स्तम्भों को मजबूत करने की जिम्मेदारी विधायिका की हैं । विधायिका द्वारा कार्यपालिका और न्यायपालिका इन दोनो को लोकहित में कार्य करने के लिये एंव प्रशासन को चलाने के लिये इनको पोषित करना जरूरी भी हैं क्योकि कार्यपालिका और न्यायपालिका कर्मी पूर्णरूप से सरकार लोककल्याण के कार्याे का क्रियान्वयन करवाती हैं एंव प्रशासन चलवाती हैं इसलिये इसके लिये पूर्णकालिक कर्मियों की नियुक्ति करना आवश्यक हैं। जनता को न्याय उपलब्ध करवाने के लिये न्यायिक कर्मियों को भी पूर्णकालिक किया जाता हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका में सरकारी नौकरशाही के अनुसार वेतन एंव अन्य सुविधाए दी जाती हैं।

तीसरे नम्बर पर विधायिका आती हैं जिसमें जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि होते हैं जो कानून बनाते हैं वे पूर्ण कालिक नहीं होते इनको समय-समय पर जनता द्वारा चुना जाता हैं। कानून बनाने वाले यही होते हैं इसलिये उन्होने अपने जीवन-यापन के लिये पेंशन एंव अन्य सुविधाओं के कानून बनाकर स्ंवय को सुरक्षित कर लिया।

अन्तिम नम्बर आता हैं लोकतन्त्र का चौथे स्तंभ मीडिया का जो जनता और प्रशासन के बीच की कडी होता हैं, जनता की बाते सरकार और सरकार की बाते जनता तक पहुंचाने का काम करता हैं, सरकार द्वारा किये गये कार्याे का लेखा-जोखा जनता तक पहुंचाता हैं, जनता को सच्चाई का आईना दिखाता हैं। यदी यह आईना नहीं हो तो लोकतन्त्र, लोकतन्त्र ना होकर ताानाशाह हो जाता लेकिन अफसोस लोकतन्त्र के इस महत्तवपूर्ण स्तम्भ की सरकार द्वारा उपेक्षा की जा रहीं हैं, जिसके कारण आज पत्रकार गरीबी की हालत में जी रहे हैं, अपनी जान को जोखिम में डाल कर समाचारों का संकलन एंव प्रसारण करते हैं, जिसमें कई पत्रकार अपने जीवन से भी हाथ धो बैठते हैं। सरकार को चाहिये पत्रकारों को सुविधाए उपलब्ध करवाये जिस प्रकार विधायिका के चुने हुए प्रतिनिधि जो अंश कालिक ही होते हैं उनको जिस प्रकार आवास , वेतन एंव अन्य सुविधाए दी जाती हैं उसी प्रकार मीडियाकर्मियों को भी आवास, वेतन एंव अन्य सुविधाए दी जाये। आज मीडियाकर्मी अपनी वाजिब समस्याओं को लेकर संघर्षरत हैं इसके लिये सरकार द्वारा शीघ्र ही उचित निर्णय लिया जाना चाहिये।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र