क्या औचित्य है मदर या फ़ादर डे को मनाने का ?

20
97

गीतांजलि पोस्ट …

मई के दूसरे रविवार को मदर डे के रूप में मनाया जा रहा है , सोशल मीडिया पर अपनी मॅा या माँ के साथ फोटा खिचकर , मॅा को समर्पित पोस्ट डालने की होड लगी हुई हैं, चाहे कोई अपनी माँ से बात करे या नहीं करे लेकिन मदर डे पर वह फेसबुक, वॉट्सअप पर मॅा के लिये पोस्ट जरूर करेगा। यह सब देखकर ऐसा लगने लगा हैं कि पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति ने हमारे समाज को अपने रंग में रंग ही लिया हैं, वास्तव में देखा जाये तो हमारी भारतीय संस्कृति में तो दिन की शुरूआत ही माता-पिता, गुरू के चरणवंदन से होती है, परिवार के सभी सदस्य एक साथ एक घर में रहते हैं तो हमारे लिये माता-पिता को सम्मान देने के लिये कोई विशेष दिन की जरूरत नहीं है अपितु उन्हे सदैव प्रेम व देखभाल की जरूरत हैं। लेकिन आज की पीढ़ी 1 जनवरी को नववर्ष, वेलेंटाईन डे, मदर्स-डे, चॉकलेट डे, फादर्स-डे जैसे अनेक विकृत डे मनाने लगी हैं जो एक फेस्टिवल बन गया हैं डे मनाने की प्रतिस्पर्धा हो गयी है। जिसके कारण वे अपना पैसा और समय बर्बाद करते हैं। वहीं कंपनिया अपने फायदे के लिए युवाओ और बच्चों को आकर्षित करने के लिए ऐसे डेज को मनाने के लिये विज्ञापनों से अपना प्रचार करते हैं और इन डे की स्पेशल पार्टियाँ मनायी जाती हैं, तो कहीं उपहार के रूप में देने के लिये उपहार खरीदे जाते हैं, जिससे फ़ायदा दुकानदारों को या कार्यक्रम का संचालन करने वाले होटल को होता हैं।

समझ में नहीं आता आखिर क्या औचित्य है इन डेज को मनाने का ? क्या रिश्तों को मनाने का या उनका अहसास करने का या उनका सम्मान करने का कोई विशेष दिन होना चाहिये? दूसरी बात माता-पिता के सम्मान के लिये अलग-अलग दिन क्यों मनाया जा रहां हैं जबकि माता-पिता तो एक ही हैं इसके लिये कोई पैरेन्ट्स डे होना चाहिये था।

वास्तव में देखा जाये तो ये हमारी नयी पीढी की कमी नहीं है, बल्कि हमारे द्वारा दिये जाने वाले संस्कारों की कमी है, बच्चे तो वही करेगें, जैसी उन्हें शिक्षा मिल रही है। हमें अपनी शिक्षा पद्वति में बदलाव लाना होगा। हमारे यहाँ की संस्कृति संयमी व नैतिक प्रेम जीवन सिखाती है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति में ऐसा नहीं है , वहाँ अधिकतर पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ नही रहते , वहाँ सयुक्त परिवार भी नही होते जैसे हमारे यहां होते है इसलिए वहां पेरेंट्स और बच्चों को मिलवाने के लिए साल का एक दिन बना दिया जिसके माध्यम से बच्चे अपने अपने पेरेंट्स से और पेरेंट्स अपने बच्चो से मिल जाते है लेकिन हमारे यहां ऐसा नही है ।

पैरेन्ट्स को चाहिये कि अपने बच्चो को संस्कारवान बनायें उन्हें कॉन्वेन्ट स्कूलों की बजाय गुरुकुलों में शिक्षा दें, जिससे बच्चों में संस्कार आये। बच्चों को समझायें कि प्रतिस्पर्धा रखो, मगर सिर्फ उन क्षेत्रों में जिनमें आप बिना तनाव के एक लम्बी-दौड़ दौड़कर अपने उद्देश्य तक पहुँचने की सामर्थ्य रखते हों । देखा-देखी ऐसे डेज मनाने की प्रतिस्पर्धा उनके किसी काम की नहीं है, इससे उनको तनाव, अशांति, असंतुलित और एक अव्यवस्थित जीवन के अलावा कुछ नहीं मिल सकता।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्रJ