बढ़ते अपराध का कारण लचीला कानून

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गीतांजलि पोस्ट…( कपिल  गुप्ता) आज लचीले कानून के कारण अपराध का बढ़ता ग्राफ सवालिया निशान बनता जा रहा है। क्योंकि अपराध बड़े शहरों सहित छोटे कस्बो , गांवो में लगातार बढ़ रहा है। यह मानना है राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का। अपराधियों पर नकेल लगाने के सरकारी दावा खोखला नज़र आ रहा हैं। हालात यह हो गई है कि अपराध और दुराचार उन इलाकों में भी बढ़ रहे हैं जहां पहले बहुत कम हुआ करते थे। जैसे गांव और छोटे कस्बों में। वे शहर जो अपनी संस्कृति और कला के रूप में जाने पहचाने जाते थे, वहां हत्या, यौन-दुराचार जैसे संगीन अपराधों में इजाफा हो रहा है। थोड़ा सा अतीत में झांकें तो इसका कारण भी समझ में आ जाता है। जानकार मानते हैं कि समाज में बढ़ रहा अपराध काफी-कुछ हमारे विकास से जुड़ा हुआ है।
विकास के नाम पर देश को पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय निगमों के हवाले कर दिया गया। पिछले कुछ दशकों से समाज में अश्लीलता बढ़ी है। समाज जिन बुराइयों और अपराधों की गिरफ्त में आ चुका है उसको बढ़ाने में बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के मॉडल की भूमिका अहम है। विज्ञापनों, फिल्मों और सीरियलों के जरिए हिंसा, बलात्कार, और स्वार्थपरता के नए सूत्र प्रचलित हुए हैं। देश में बेरोजगारी, झगड़े-फसाद, जात-पांत जैसी गहन समस्याएं नए रूपों में पनपी हैं।
सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं बलात्कार के मामले। अश्लील विज्ञापनों और नग्न प्रदर्शनों ने समाज में आजादी नहीं, व्यभिचार को बढ़ाया दिया है। रातोंरात धन कमाने की लिप्सा ने समाज में अपराधियों की एक बड़ी जमात ही खड़ी कर दी है। प्रशासन और समाज सेवकों की भूमिका कारगर नहीं बन पा रही है। समाज विरोधी और अपराधी तत्त्वों पर समाज का दबाव खत्म हो गया है। आजदी के नाम पर उद्दंडता, अश्लीला और फरेब जैसी सामाजिक बुराइयों का बोलबाला हो गया है।
पुलिस अपराध रोकने में नाकाम नज़र आती दिख रही है।आये दिन हो रही हिंसक,बलात्कारी घटनाओं पर पुलिस ज्यादातर चुपचाप देखती रहती है। आए दिन जिस तरह की हैरत में डालने वाली घटनाएं घट रही हैं, उससे यह बात सच साबित हो रही है कि अपराधों को रोकने में न तो पुलिस सक्षम दिखती है और न तो समाज के जिम्मेदार लोगों की पहल ही इस दिशा कारगर होती दिख रही है। हमारे देश का कानून इतना लचीला है कि ज्यादातर अपराधी अपराध करने के बाद भी आसानी से छूट जाते हैं या उन्हें सजा इतनी देर में मिलती है कि उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। इसलिए अपराधियों के हौसले निरंतर बढ़ते रहते हैं। कानून को कठोर बनाने के लिए सरकार व विपक्ष को एक मत होकर इसे मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए। जिससे एक अपराधी कोई भी अपराध करने से पहले हज़ार बार सोचे कि वो ये अपराध करेगा तो उसे किस प्रकार का कठोर दंड मिलेगा। मजबूत कानून व्यवस्था से अपराधों के बढ़ते ग्राफ में जरूर कमी आ सकती है। समाज के वृहत्तर हित में और अन्य लोगों को अपराध करने से रोकने के लिए उपाय है| प्राचीन तमिल संत थिरुवावल्लुर ने कहा है, “जिन लोगों ने ह्त्या जैसे संगीन अपराध किये हैं उन्हें कडा दंड देने में राजा का कृत्य ठीक वैसा ही है मानो कि फसलों को बचाने के लिए एक किसान खरपतवार को हटाता है|” एक अच्छी सरकार को कानून का सम्मान करने वाले अपने नागरिकों का सर्व प्रथम ध्यान रखना चाहिए| इसके लिए आवश्यक है कि अपराधियों के साथ सख्ती से निपटे| भारत में वर्तमान में विद्यमान स्थिति इसके ठीक विपरीत है| यहाँ कानून का सम्मान करने वाले नागरिक पीछे धकेल दिए गए हैं और अपराधियों को कोई भय नहीं है| अपराध लगातार बढ़ रहे हैं| वे न केवल बढ़ रहे हैं अपितु सुनियोजित और क्रूरतर तरीके से किये जाने लगे हैं| अपराधी लोग और अधिक धनवान व दुस्साहसी हो रहे हैं।
सही बात तो यह है कि जिस प्रकार की गंभीरता एक सभ्य राष्ट्र में अपराधों की रोकथाम के लिए होनी चाहिए वह भारत में बिलकुल नहीं है| इस विषय पर आंकड़ों को देखकर सत्ता में शामिल लोगों को शर्म आनी चाहिए किन्तु उन्हें तो व्यक्तिगत कार्यों से ही फुरसत नहीं है और प्रशासन उनके हाथों की मात्र कठपुतली बनकर रह गया है।