बेटी बचाओं अभियान का कोई औचित्य नहीं जब सरकार बेटियों की सुरक्षा ही नहीं कर सकती

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रेणु शर्मा , संपादक गीतांजलि पोस्ट
एक तरफ जहा सरकार ने बेटी बचाओं अभियान चलाया हुआ हैं वहीं दूसरी और समाज में बेटियों की र्दुगति हो रही है जब सरकार बेटियों की सुरक्षा ही नहीं कर सकती तो सरकार को बेटी बचाओं अभियान को बन्द कर देना चाहिये। हॉल ही में मंदसौर , बाडमेर , जयपुर दो से तीन साल की बालिकाओं के साथ र्दुव्यवहार का सुनकर अंचभा होता हैं ये तो कुछ ही मामले हैं जो मीडिय़ा के सामने आ गये, ना जाने कितनी बालिकाओं के साथ र्दुव्यवहार होता होगा ? आखिर क्या हो गया हमारे समाज को ? कहा गयी इंसानियत ? दस से साठ साल के लोगों द्वारा दो से तीन साल की बालिकाओं को अपनी हवस का शिकार बनाने वालों का दिल जरा भी नहीं पसीजा होगा , ऐसी ही घटना उनकी अपनी नातिन या उनकी पोती के साथ हुई होती तो कैसा उन्हे कैसा लगता ? आखिर क्यों अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं ?

हमारी कानून व्यवस्था कमजोर है इसलिए भी अपराध बढ रहे हैं हांलाकि यहां कानून तो सभी अपराधों के लिये बनाये गये हैं उसमें सजा का प्रावधान भी हैं लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी हैं कि यहां न्याय के लिये आने वाले पीडितों को और पीडित होना पडता हैं, तारीख पर तारीख मिलती रहती हैं न्याय की उम्मीद में लोगों की जवानी से बुढ़ापा आ जाता हैं जिसके कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं क्योकि वे जानते है हमारी न्याय व्यवस्था की प्रकिया को कि कितने समय में न्यायालय द्वारा फैसला सुनाया जायेगा तब तक समय बदल जायेगा।

वहीं दूसरी और राजनेताओं, सामाजिक संस्थाओं को जैसे ऐसी ही वारदातों का इंतजार रहता हो जैसे ही ऐसी घटनाए घटित होती हैं वे पीडित के लिये कुछ करने की बजाय उसी पर राजनीति करने लगते हैं एक पक्ष दूसरे पक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप लगाता हैं तो कही कैंडल मार्च , मंदिरों में दीपदान करते नजर आते हैं तो कही पीडित की सहायता के लिये सरकार को ज्ञापन देते हैं वहीं मीडिया ऐसे मामलों में को लेकर अपनी टीआरपी बढाने के लिये राजनेताओं, सामाजिक संस्थाओं को बुलाकर बहस करवाने लगती हैं। इस सारे कार्याकलापों पर शर्म आती हैं जो पीडितों की सहायता करने के बजाय उस पर राजनीति करते हैं या अपना स्वार्थ साधते हैं।

देश का युवा भटक गया हैं,स्कूल वाले केवल किताबी ज्ञान दे रहे हैं, उन्हे सिफ पैसा कमाने से मतलब हैं विद्यार्थियों में संस्कार आ रहे हैं या नहीं उन्हे इससे कोई सरोकार नहीं हैं वहीं बच्चों के अभिभावक पैसा कमाने के चक्कर में या अपने आप में इस प्रकार व्यस्त हैं कि उनके पास अपने बच्चों के लिये ही पर्याप्त समय नहीं हैं ऐसे अपराधों के लिये परिवार भी जिम्मेदार हैं।

समाज में महिलाओं और बालिकाओं के साथ बढ़ते अपराधों को देखकर मन दुखी हो जाता हैं और लगता हैं यदी ऐसा ही होना था तो बेटी को पैदा ही क्यों किया जाये । आखिर क्यों अपराधियों के हौसले बुंलद हो रहे हैं , अपराधियों को कानून का कोई खौफ नहीं हैं । पिछले कुछ दिनो में राजस्थान सहीत देश भर में हुए बलात्कारों पर नजर डाले तो ऐसा लगता हैं जैसे अपराधियों में इंसानियत ही नही हैं और ना ही उसे कानून का डर हैं। खेर इंसानियत तो व्यक्ति को मिलने वाले संस्कारों के से आती हैं लेकिन कानून तो देश का होता हैं उससे तो भय होना चाहिये।

सरकार को चाहिये एसे मामलों में अपराधियों की पहचान कर पीडित को त्वरित गति से न्याय दिलवाये और ऐसे अपराधों को अंजाम देने वालों के लिये मौत की सजा दे जिससे भविष्य में कोई ऐसा अपराध नहीं कर सकेगा। यदि सरकार ऐसा नहीं कर सकती है तो बता दे , जनता अपने अनुसार अपराधियों को सजा दे देंगी तब यह नहीं कहना की जनता ने कानून की पलना नहीं करी।

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र