गाय, गंगा, गीता और धरा का जरूरी हैं संवधर्न और संरक्षण

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भगवान कृष्ण द्वारा महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन को दिया गया गीता का ज्ञान भारत में ही नही सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक धर्म के अनुयायियों द्वारा पढा जाता हैं क्योंकि गीता मात्र एक पुस्तक ही नहीं अपितु यह मानव को जीवन के उद्देश्य का ज्ञान करवाकर उसकी पूर्ति के लिए रास्ता बताती है, यह एक मार्गदर्शक की तरह है। भगवान कृष्ण (गोविन्द) ने भी गौपालन कर गायों का महत्तव बताया वही हमारे देश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर ने कहा कि भारत में मनुष्य होने की बजाय गाय होना ज्यादा सुरक्षित हैं। वही दूसरी ओर अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द से अमेरिकी पत्रकारों ने पूछा कि किस पशु का दूध सबसे अच्छा होता हैं तो उन्होने जवाब दिया कि भेस का दूध सबसे अच्छा होता हैं तो उन्होने दूसरा सवाल किया आप तो गाय की पूजा करते हो फिर गाय के दूध को अच्छा क्यों नही बताया इस पर स्वामीजी ने जवाब दिया गाय हमारी माता हैं पशु नहीं हैं एंव राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी ने कहा था मेरे लिए गोवध और मनुष्य-वध एक समान है। सम्राट अशोक महान का विश्वास था कि राष्ट्र की समृद्धि और गौरव के लिये गायों का विकास आवश्यक है। मुगलवंश के संस्थापक बाबर ने अपने पुत्र हुमायुं को गायों को कभी न मारने को लिखा। अबुल फजल ने आईने अक्बरी में लिखा कि हिंदू प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए अकबर ने गोमांस खाने पर प्रतिबंध लगा दिया था हमारे सर्वोच्च न्यायालय के 1958 के एक निर्णय में उल्लेख है कि 18वीं सदी में हैदर अली का आदेश था कि गोवधकर्ता के हाथ काट दिये जाने चाहिए।

भारत राष्ट्र जो एक सनातन राष्ट्र हैं जिसमें मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही गाय, गंगा, धरती और हमारी जन्म देने वाली माता जो प्राणीमात्र का पालन करती हैं उन सभी को माताओं का दर्जा देकर उसकी पूजा की जाती रही हैं। धरती माता प्राणीमात्र को रहने का आसरा देती हैं, उसे भोजन उपलब्ध करवाती हैं तो हमारी मॉ जो हमेें जन्म देने के साथ-साथ हमारा लालन-पालन करती हैं यह सभी जानते हैं। गाय और गंगा का महत्तव भी इनसे कम नहीं हैं यह आधुनिक विज्ञान में स्पष्ट भी हो गया हैं।

गाय और गंगा प्राणीमात्र के लिये संजीवनी के समान हैं इसलिये इनको माता की उपाधी दी गयी हैं। वैसे तो पानी के लिये बहुत सारी नदियां हैं उनमें से केवल गंगा नदी को, दूध के लिये बहुत सारे पशु भेस, बकरी इत्यादी हैं उनमें से केवल गाय को ही मॉ की उपाधी दी गयी हैं तथा इन दोनों की रक्षा और संवधर्न के लिये हमारा भारतवर्ष हमेशा प्रयत्न करता रहा हैं, मुगलों एंव अंग्रेजो के शासन काल में हमारे कई देशी राजाओं एंव गौ भक्तों ने जिनकी संख्या हजारों में ही नहीं बल्कि लाखों में हैं जिन्होने गौवंश को बचाने के लिये, गौहत्या को रोकने के लिये संघर्ष किया जरूरत पडने पर अपने प्राणों का बलिदान दिया हिन्दू ही नहीं मुसलिम नेताओं हकीम अजमलखाँ, सरसैयद अहमद, डॉ. सैयद महमूद, मौ. अब्दुल बारी आदि ने गो-रक्षा का समर्थन किया है।

इतिहास उठा कर देख लो किसी धर्म में गाय के वध के लिये नहीं कहा, यहा तक की इस्लाम में गाय पालने को मुसलमान के लिए धर्मोपयुक्त काम माना हैं, इस्लाम में गौहत्या और गौमांस की पूरी मनाही नहीं है लेकिन कुरान शरीफ का निर्देश प्रतिबंध की दिशा में ही है उसमें दुधारू गाय, छोटे बछड़े और बूढ़ी गाय की बलि देने पर पाबंदी है और हजरत मोहम्मद ने खुद गाय पाली थी।

हमारे वेदों में तो गाय का नाम ही ‘अवध्न्या’ यानि ‘जो मारी न जाए’ है। सनातन काल से हमारी संस्कृति में गाय और गंगा की पूजा चलती आ रही हैं लेकिन जैसे ही विदेशी आक्रांताओं विशेष रूप से अंग्रेजो के आने के बाद से ही गायों का वध करने की शुरुवात हो गयीं, गाय का मांस खाया जाने लगा। जब से अंग्रेजो ने हमारे देशी कुटिर उद्योंगों को बन्द करके औद्योगिकीकरण कर पाश्चात्य जीवन पद्वति की नींव डाली उससे उद्योगों का अपशिष्ट पद्वार्थ बहकर गंगा में जाने लगा तभी से गंगा प्रदूषित होने लगी और आज गंगा इस कदर प्रदूषित हो चुकि हैं कि उसकी सफाई के लिये सफाई अभियान चलाये जा रहे हैं। इसी तरह से शशि थरूर जैसी मानसिकता वाले लोगों के कारण भारत जैसे राष्ट्र में हमारी गाय मॉ को काट कर खाया जा रहा हैं उनको स्वंय को भारतीय कहने में भी शर्म आनी चाहिये कि जो कहते हैं कि भारत में मनुष्य होने की बजाय गाय होना ज्यादा सुरक्षित हैं।

आजादी की लडाई में वीर सावारकर, चंद्रशेखर आजाद, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों ने गो हत्या के विरोध में आवाज उठाई। यह वचन दिया गया कि स्वतंत्र भारत में गो हत्या पर रोक लगेगी।

भारत आजाद हुआ तब यह उम्मीद जागी थी कि गौहत्या पूर्ण रूप से बन्द हो जायेगी उस पर प्रतिबन्ध लग जायेगा हालांकि संविधान की धारा 18 में गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात है लेकिन उस सरकार पर धिक्कार हैं जिसने अपने शासन काल में गौहत्या के लिये नये-नये बूचडखाने खोल कर गाय रूपी पशु नही बल्कि गाय रूपी मॉ का मांस निर्यात करने लगे, इसके विरोध में हमारे साधु-संतों एवं गौभक्तों ने आन्दोलन किये, अनशन किये और अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।

इस भाजपा सरकार पर भी लानत हैं क्योकि गाय के नाम पर वोट मांगने वाली सरकार से उम्मीद थी कि वो गौमाता और गंगा मॉ का उद्वार करेगी लेकिन इन्होने भी कुछ नही किया। जबकि विश्व के अन्य देश क्यूबा, ईरान में गो हत्या निषेध हैं तो बर्मा में गो हत्यारों को फांसी दी जाती थी, इंडोनेशिया में गोमांस भक्षण निषिद्ध है और हमारे देश में आजादी के 71 साल पूरे होने को आये लेकिन अभी तक गौहत्या रोकने के लिये पूरे देश में एक समान कानून नहीं बन पाया यद्यपी कुछ राज्यों जैसे उडिसा, मघ्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडू, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, मणिपुर, उत्तराखण्ड, गुजरात, छत्तीसगढ़ की सरकारों ने अपने-अपने हिसाब से अपने राज्य में गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाया गया हैं , इतिहास गवाह हैं जिन जातियों ने गो-रक्षण किया वे उन्नति के शिखर पर पहुँची और जिन्होंने गो-भक्षण किया वे अवनति की ओर गयी हैं।

इसी तरह रासायनिक खाद, पौध संरक्षण जहर रूपी दवाओं का प्रयोग कर धरती मॉ को जहरीली बना दिया पहले जिसके उत्पाद अमृत के समान होते थे वही आज जहर के समान हो गये हैं जिनसे प्राणी मात्र को विभिन्न प्रकार कि बिमारीया हो रही हैं। इसी प्रकार बलात्कार, कन्या भूण हत्या, दहेज हत्या इत्यादी के रूप में हमारी स्वंय की मॉ, बहन, बेटियों की दुदर्शा हो रही हैं। जब तक गाय, गंगा, धरती और हमारी मॉ इन चारों माताओं का संवधर्न, संरक्षण नहीं किया जायेगा तब तक मानव ही नही संपूर्ण प्राणी असुरक्षित रहेगा। गाय, गंगा, गीता और धरा यही भारतवर्ष की पहचान हैं। यह चारों मिलकर ही एक चतुभुर्ज बनाते हैं यदी इसकी कोई भी एक भुजा को काट देगा तो यह चतुभुर्ज नष्ट हो जायेगा अत: इनका संवधर्न और संरक्षण जरूरी हैं।

लेखक- रेणु शर्मा और सीताराम आचार्य