धर्म के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म निरपेक्षता का नाजायज फायदा नही उठाओ

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हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म निरपेक्षता हैं लेकिन संविधान ने किसी ने यह अधिकार नहीं दिया की आप किसी की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड करते हुए उसके धर्म के बारे में कुछ गलत बोलों।

अपने वक्तवयों के कारण अकसर विवादों में रहने वाले छत्तीसगढ के सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता भगवाधारी संत स्वामी अग्रिवेश की लोगों ने जमकर पिटाई कर दी क्योकि स्वामी अग्रिवेश हिन्दू होते हुए बीफ़ (गाय का मांस) खाने को सही बता रहे थे, श्रीनगर में उन्होंने कहा कि अयप्पा , तिरुपति, अमरनाथ अंधविश्वास है ,अमरनाथ यात्रा के 15 दिन कम कर दिया तब इस पर एक पत्रकार ने स्वामी की राय पूछी तो स्वामी ने कहा में तो कहता हूं 15 दिन ही क्यों इसे पूरा ही बंद कर देना चाहिए यह अंधविश्वास है। एक बार ग्लोबलवार्मिंग से शिवलिंग पिघल गया तो लोगो की आस्था के लिए तत्कालीन  गवर्नर एस के सिंहा ने वहा जाकर बर्फ से शिवलिंग बनवाया था  मूर्ति-पूजा को गलत बताते हुए अमरनाथ यात्रा को बन्द करने का कह रहे थे साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के  विभिन्न देशों की यात्राओं के दौरान की गयी उनके पूजा-पाठ पर कटाक्ष करते हुए उसे पांखड  बताते  हुए कहते है प्रधानमंत्री का काम पाखंड करना नही है यह देश के संविधान के खिलाफ है। हमारी पुरानी चिकित्सा जिसमें गणेश के सिर पर हाथी का सिर जोड़ा गया था उसको अन्धविश्वास बता रहे हैं साथ ही हिन्दूओं की आस्था का प्रतीक गंगा नदी के बारे में जिसके बारे में कहते हैं कि गंगा में डुबकी लगाने से पाप नही धुलेगें बल्कि उसमें डुबकी लगाने से बीमार हो जाओगे।

गंगा के बारे में ऐसा कहने वाले से मेरा सवाल है कि गंगा का पानी ही हैं जिसे आप सेकड़ो सालों तक सुरक्षित रख सकते हैं यदी कोई दूसरा पानी होता तो 4-5 दिनों में ही खराब हो जाता लेकिन इतिहास गवाह हैं  गंगा का पानी सालों तक खराब नही होता, इस बात को वैज्ञानिक भी मान चुके हैं लेकिन अंचभा होता हैं उस पवित्र पानी के बारे में कोई जब कोई भगवा पहने हुए कोई साधु-संत ऐसी बात करे।

जैसा की सभी जानते हैं भारत राष्ट्र तीन ओर से समुद्र से और उत्तर में हिमालय पर्वत माला से घिरा हुआ हैं जो भारत राष्ट्र की पहचान हैं, इसके साथ-साथ राम और कृष्ण जैसे राम-राम, जय श्री कृष्ण के शब्दों से यहां अभिवादन किया जाता हैं जो अन्य देशों में इसकी अलग पहचान बनाता हैं, गंगा नदी की पवित्रता और पावनता में हमारी आस्था के साथ कुभं मेलों का आयोजन, हमारे विभिन्न पौराणिक ग्रन्थ, वेद-पुराण के साथ-साथ हमारे भगवा वेश धारी संत जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए इसका प्रचार करते हैं तो मानसरोवर, कैलाश, अमरनाथ, सावन की कांवड यात्रा के साथ-साथ हमारे विभिन्न धार्मिक पर्व से हमारी पहचान होती हैं क्योकि यह सारे कार्यकलाप हमें एक-सूत्र में बांधते हैं, इनका आयोजन हमें हमारी प्राचीन थातीयों पर गौरवान्वित होने का सौभाग्य देते हैं अत: यह हमारी राष्ट्रीय एकता के लिये बहुत ही आवश्यक हैं इस तरह के आयोजनों का विरोध करना विक्षिप्त मानसिकता वाले व्यक्ति की ही सोच  हो सकती हैं।

हमारा धर्म जिसे सनातन धर्म कहा जाता हैं कितना व्यापक, कितना उदार, कितना विशाल हैं, कितना लचीला हैं कि इसमें भगवान को मानों या नहीं मानों कोई फर्क नहीं पडता। यदी कोई भगवान में यकिन करे तो आस्तिक और भगवान में यकिन नहीं करे तो वह नास्तिक हैं परन्तु वह हिन्दू ही रहेगा । भगवान को प्रतीक मानकर की जाने वाली मूर्ति की पूजा करता हैं तो साकार पूजक हो यदी मूर्ति की पूजा नहीं करे हो तो वह निराकार पूजक हैं लेकिन वह हिन्दू ही हैं। किसी देवी-देवता, गुरू, संत इत्यादी की पूजा रोजाना स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहन कर पूजा करे तो सबसे अच्छा हैं यदी वस्त्र नये नही हैं तो साफ हो तो भी सही हैं यदी मैले वस्त्र हैं तो भी सही हैं पूजा की जा सकती हैं। यदी किसी का नहाने का मन नहीं हैं या तबियत खराब हैं या अन्य कोई कारण हैं तो मुहं-हाथ धोकर , यदी मुहं-हाथ वही धो सकते तो आचमन कर , यदी आचमन भी नही कर सकते तो खुद को भगवान का नाम लेकर पवित्र कर पूजा-पाठ किया जा सकता हैं। पूजा-पाठ करने के लिये कियी निश्चित स्थान, आसन की जरूरत नही होता देवालय , घर, नदी किनारे, निर्जन वन में बैठकर ,खडे होकर, लेटकर चलते हुए किसी भी अवस्था में भगवान का नाम लिया जा सकता हैं । यह भी जरूरी नही कि आप किसी निश्चत आसन जैसे पदमासन, व्रजासन, सुखासन अवस्था में किसी कुचालक आसन जैसे मृग छाल, ऊन से बने आसन पर पूजा करे। यदी यह भी नही कर सकते तो आप जो भी काम कर रहे हो, यह सोच कर करे की मैं यह भगवान के लिये कर रहा हॅू, ईश्वर को पुत्र, सखा, माता-पिता, भाई पति, पत्नी, पूरी सृष्टि का निमार्ता मानते हुए किसी भी रूप में उसकी आराधना कर सकते हैं उसकी पूजा कर सकते हैं। यदी कोई उसके कीर्तन, भजन करता हैं, उसकी लीला देखता हैं या उसकी लीला करता हैं , लीला सुनता हैं या सुनाता हैं तो वह भी उसकी पूजा ही हैं। यदी कोई ईश्वर से देष-भाव रखते हुए उसे कोसता हैं, उसे गाली देता हैं तो वह भी पूजा ही होगी क्योकि चाहे कोई भी रूप हो उसका नाम लिया जा रहा हैं इसका उदाहरण रावण, कंश, राजा शिशुपाल हैं जिन्होने ईश्वर को गालिया दी थी। ईश्वर की इतने उदार रूप में व्याख्या करने वाला धर्म हिन्दू धर्म हैं जिसमें सभी प्राणी, वनस्पति, जीव-जन्तु समाये हुए हैं।

हिंदू धर्म उस धर्म रूपी माँ के समान है जिसका बेटा नालायक़ है वह उसकी क़द्र नही करता तब भी माँ उसका ही हित चाहती है ऐसे महान, सनातनी हिंदू धर्म को हमारा शत-शत नमन।

लेखक-सीताराम आचार्य , रेणु शर्मा

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