उम्मीदों के दीप जला-पुस्तक समीक्षा

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गीतांजलि पोस्ट

(रचनाकार-रामगोपाल राही) कहते हैं कि ‘उम्मीद पर दुनिया कायम है’ ये उम्मीद ही तो है जो मानवता को जीवित रख उस पर विश्वास जगाती है वरन् आज जीवन में समस्याएँ कम नहीं हैं। उम्मीद, रात के बाद दिन की। उम्मीद, निराशा के बाद आशा की और उम्मीद, पतझड़ के बाद वसन्त की।

उम्मीद न हो तो जीवन कहाँ? ऐसे ही कुछ उम्मीदों और आशाओं के दीप जलाता काव्य-संग्रह लेकर आये हैं वरिष्ठ साहित्यकार रामगोपाल ‘राही’।
अपने काव्य-संग्रह में ‘माँ’ से लेकर ‘हैं बेटियों में हौसले’ कविताओं में जहाँ से एक ओर जीवन की समस्याओं से अवगत कराते हैं वहीं समाधान देते हुए आशा की किरण भी दिखाते हैं। स्वर्णिम इतिहास के गौरव की कवितायें भी हैं तो भू्रण हत्या, पर्यावरण, पानी, राष्ट्र भाषा आदि को लेकर होने वाली समस्याओं की कवितायें भी सम्मिलित हैं।
जीवन में सभी पात्रों का संतुलन आवश्यक है, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। कवि रामगोपाल ‘राही’ ने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को शब्दों में पिरोया है। कवितायें जीवन के प्रत्येक पक्ष को छूती हैं। कुल मिलाकर सीधी सरल भाषा एवं आम जिन्दगी को दर्शाता हुआ यह काव्य-संग्रह कहीं न कहीं उम्मीदों के दीप तो जलाता ही है।