राखी है भाई की मंगल-कामना का सूत्र

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रक्षाबंधन हमारा राष्ट्रव्यापी पारिवारिक पर्व है, ज्ञान की साधना का त्यौहार है। श्रवण नक्षत्र से युक्त श्रावण की पूर्णिमा को मनाए जाने के कारण यह पर्व ‘श्रावणी’ नाम से भी प्रसिद्ध है। प्राचीन आश्रमों में स्वाध्याय के लिए, यज्ञ और ऋषियों के लिए तर्पण कर्म करने के कारण इसका ‘ऋषि तर्पण’, ‘उपाकर्म’ नाम पड़ा। यज्ञ के उपरांत रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा के कारण रक्षाबंधन लोक में प्रसिद्ध हुआ।

रक्षाबंधन का प्रारंभ कब और कैसे हुआ इस संबंध में कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। एक किवदंती है कि एक बार देवता और दैत्यों का युद्ध शुरू हुआ। संघर्ष बढ़ता ही जा रहा था। देवता परेशान हो उठे। उनका पक्ष कमजोर होता जा रहा था। एक दिन इंद्र की पत्नी शचि ने अपने पति की विजय एवं मंगल कामना से प्रेरित होकर उन को रक्षा सूत्र बांधकर युद्ध में भेजा। इसके प्रभाव से इंद्र विजयी हुए। इस दिन से राखी का महत्व स्वीकार किया गया और रक्षाबंधन की परंपरा प्रचलित हो गई।

श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर स्वाध्याय और यज्ञ करते थे। इसी माह यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी श्रावण-पूर्णिमा को। इसमें ऋषियों के लिए तर्पण कर्म होता था, नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता था। इसलिए इसका नाम ‘श्रावणी उपाकर्म’ पड़ा। यज्ञ के अंत में रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा थी इसलिए इसका नाम रक्षाबंधन भी लोक में प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रतिष्ठा को निभाते हुए ब्राह्मणगण आज भी इस दिन अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते हैं।

मुस्लिम काल में यही रक्षासूत्र अर्थात् राखी बन गया। यह रक्षी वीरन अर्थात वीर के लिए थी। हिंदू नारी स्वेच्छा से अपनी रक्षार्थ वीर भाई या वीर पुरुष को भाई मानकर राखी बांधती थी। इसके मूल में रक्षा कवच की भावना थी। इसलिए विजातीय को भी हिन्दू नारी ने है अपनी रक्षार्थ राखी बांधी। मेवाड़ की वीरांगना कर्मवती का हिमायू को राखी भेजना इसका प्रमाण है। (आज कुछ इतिहास इस बात को नहीं मानते इसे अंग्रेजों मुसलमानों की चाल मानते हैं।)

काल की गति कुटिल है। वह अपने प्रबल प्रवाह में मान्यताओं, परंपराओं, सिद्धांतों और विश्वास को बहा कर ले जाती है और छोड़ देती है उस के अवशेष। पूर्व काल का श्रावणी यज्ञ एवं वेदों का पठन-पाठन मात्र नवीन यज्ञोपवीत धारण और हवन आहुति तक सीमित रह गया। वीरों को राखी बांधने की प्रथा विकृत होते होते बहन द्वारा भाई को राखी बांधने और दक्षिणा प्राप्त करने तक ही सीमित हो गई।

20वीं सदी से रक्षाबंधन पर्व विशुद्ध रूप में बहन द्वारा भाई की कलाई में राखी बांधने का पर्व है। इसमें रक्षा की भावना लुप्त है। है तो मात्र एक कोख से उत्पन्न होने के नाते सतत स्नेह, प्रेम और प्यार की आकांक्षा। राखी है भाई की मंगल-कामना का सूत्र और बहन के मंगल-अमंगल में साथ देने का आह्वान। बहन विवाहित होकर अपना अलग घर संसार बसाती हैं। पति, बच्चों, पारिवारिक दायित्व और दुनियादारी में उलझ जाती है। भूल जाती है मात्रकुल को, एक ही मां के जाए भाई और सहोदरा बहन को। मिलने का अवसर नहीं निकाल पाती।

विवशताएं चाहते हुए भी उसके अंतर्मन को कुंठित कर देती हैं। रक्षाबंधन और भैयादूज यह दो पर्व दो सहोदरों-बहन और भाई को मिलाने वाले दो पावन प्रसंग हैं। हिंदू धर्म की मंगल मिलन की विशेषता ने उसे अमृत का पान कराया है।
कच्चे धागों में बहनों का प्यार है।
देखो राखी का आया त्योहार है।।
रक्षाबंधन बहन के लिए अद्भुत, अमूल्य, अनंत प्यार का पर्व है। महीनों पहले से वह इस पर्व की प्रतीक्षा करती है। पर्व समीप आते ही बाजार में घूम घूम कर मन चाही राखी खरीदती है। वस्त्राभूषणों को तैयार करती है। ‘मामा-मिलन’ के लिए बच्चों को उकसाती है। रक्षाबंधन के दिन वह स्वयं प्रेरणा से घर आंगन बुहारती है। लीप पोत कर स्वच्छ करती है। सेवियां, जवे, खीर बनाती है। बच्चे स्नान ध्यान कर नववस्त्रों में अलंकृत होते हैं। परिवार में असीम आनंद का स्त्रोत बहता है।

आज राजनीति ने हिंदू धर्म पर प्रहार करके उसकी जड़ों को खोखला कर दिया है। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की ओट में हिंदू भूमि भारत में हिंदू होना सांप्रदायिक होने का परिचायक बन गया है। ऐसी विषाक्त वातावरण में भी रक्षाबंधन पर्व पर पुरातन परंपरा का पालन करने वाले पुरोहित घर घर जाकर धर्म की रक्षा का सूत्र बांधता है। रक्षा बांधते हुए –
येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां प्रतिबघ्रामि, रक्षे! मा चल, मा चल।।
मंत्र का उच्चारण करता है। यजमान को बताता है कि रक्षा के जिस साधन (राखी) से महाबली राक्षसराज बली को बांधा गया था उसी से मैं तु हें बांधता हूं। हे रक्षासूत्र ! तू भी अपने धर्म से विचलित ना होना अर्थात इसकी भली-भांति रक्षा करना।

रेणु शर्मा

(लेखिका गीतांजलि पोस्ट की प्रधान सम्पादक हैं)

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