विकास के साथ पर्यावरण की राह होना है आवश्यक

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हमें विकास तो करना है, लेकिन विकास का टिकाऊ होना आवश्यक है। इसके लिए जलवायु परिवर्तन और विकास बाध्यताओं से निपटना जरूरी होगा। अगर समय रहते शुरुआत न की गई तो पृथ्वी और इसके साथ ही हमारी भावी पीढ़ियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। 21वीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्द्ध में आज मनुष्य और पृथ्वी के सहअस्तित्व की संभावना संदिग्ध लगने लगी है।

हम जिस राह पर चल रहे हैं, वह पृथ्वी के भविष्य को खतरे में डालेगी। हमने समय रहते राह न बदली, तो हम और हमारी भावी पीढ़ियां भी गहरे संकट से जूझेंगी। तरक्की व विकास की बाध्यताओं और पर्यावरण के प्रति सम्मान के बीच अंतर्संबंध स्थापित किए बिना विकास अर्थहीन सिद्ध होगा। टिकाऊ विकास आज एक आकर्षक नारा भर नहीं, ऐतिहासिक आवश्यकता है। पूरी दुनिया में हो रही तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के परिणाम हमारे सामने आने लगे हैं ।

पूर्वी भारत के बडे हिस्सों में अभूतपूर्व बरसात और बाढ़, बढ़ते तापमान और गड़बड़ मौसम और घटता कृषि उत्पादन इसके कुछ लक्षण हैं। हाल ही में गठित जलवायु परिवर्तन परिषद को जटिल घरेलू और वैश्विक मुद्दों से जूझना होगा। अब इस बात के पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध हैं कि वैश्विक तापमान वृद्धि दीर्घावधि कुदरत की राह कुछ समय बाद होने वाली परिघटना नहीं, बल्कि मनुष्यों की गतिविधियों का परिणाम है। जलवायु और पर्यावरण परिवर्तन के मुद्दों से दो – दो हाथ करने को अब और नहीं टाला जा सकता। यह बात सभी समझ रहे हैं कि सस्ते तेल के जमाने लद चुके, लेकिन हम यही मानने पर तुले हैं कि तेल के दाम बढ़ने की प्रवृत्ति अस्थायी है, यह बदलेगी ।

संचयित ऑयल बांड और कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों के बावजूद कम वसूली के परिणामस्वरूप जारी होनेवाली बांड में निवेश भारी घाटे का सौदा होंगे । यह तेल कम्पनियों के लिए तो हानिकर होगा ही, वित्तीय औचित्य और जलवायु परिवर्तन से जुड़े सरोकारों के संदर्भ में भी गैरजिम्मेदारी होगी। पेट्रोलियम उत्पादों के लगभग रोज बदलते मूल्यनिर्धारणों की सिरदर्दी तो खैर भारत को विरासत में मिली है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में स्थिति बिगड़ती ही चली गयी हैं। शुल्कदर और पेट्रोलियम मूल्य को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखना किसी भी ऊर्जा रणनीति का अपरिहार्य अंग है। मांग में कमी लाने के अलावा वैकल्पिक ईंधन के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

अक्षय ऊर्जा मंत्रालय का अधिभार परम्परागत रूप से राजनीतिक स्तर पर हल्के-फुल्के मंत्रियों के पास रहा है। लेकिन अक्षय ऊर्जा संबंधी शोध अन्य स्थानों पर हो रहे प्रौद्योगिक संबंधी बदलावों से दो कदम आगे रहना, कृषि अपशिष्ट-बायोगैस-सौर ऊर्जा जैसे कई अक्षय स्रोतों के मामले में हमारी अपेक्षाकृत बढ़त का दोहन जैसे मुद्दों का हमारी मुख्यधारा ऊर्जा नीतियों के अंग के तौर पर समेकन जिस स्तर के राजनीतिक अधिकार और इच्छाशक्ति की मांग करता है, वह अब तक तो कभी दिख नहीं पाई।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के मुद्दों पर-प्रदूषण के दोषी हर्जाने की भरपाई करें और विकासशील देशों को परिणामात्मक नियंत्रण और आर्थिक गतिविधियों के उनके प्रतिमान में परिवर्तनों को स्वीकार करने से मुक्त रखा जाये, इस सिद्धान्त पर आधारित हमारी पारंपरिक स्थिति से अब तक हमारा काम बखूबी चला है। यह भी सच है कि प्रदूषण का कुल संग्रह (प्रवाह नहीं) प्राथमिक रूप से विकसित देशों की देन है और शमन का आधारभूत भार उन्हें ही झेलना चाहिए। फिर भी, जैसे-जैसे उभरते बाजार आर्थिक गतिविधि की रफ्तार तेज करेंगे, प्रदूषकों के प्रवाह में उनका योगदान अधिकाधिक बढ़ेगा और भारत और चीन जैसे जनबहुल देशों की भूमिका भी बढ़ेगी। तब अमेरिका और अन्य देशों को इस बात पर राजी करना कठिन हो जाएगा कि हमें ऐसे दायित्वों से पूरी तरह मुक्त बना रहने दिया जाए।

संक्षेप में कहा जाए तो दायित्वपूर्ति की छूट तो हमें अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर हमें नेतृत्व सम्भालना है, तो दायित्वों से पूरी तरह मुक्त रखे जाने का दबाव बनाए रखना कठिन हो जाएगा। भारत के प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों में से एक ग्रामीणों द्वारा खाना पकाने के लिए गोबर-लकड़ी जैसे ईंधन का उपयोग है। इस प्रक्रिया में पैदा होने वाले कत्जल, धुएं और अन्य अपशिष्टों में भारी मात्रा में कार्बन होता है। ग्रामीणों की ईंधन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के दोहन, गैस का इस्तेमाल बढ़ाने या अक्षय ऊर्जा ईंधनों को प्राथमिकता सूची पर सर्वोच्च स्थान दिया जाना जरूरी है।

रेणु शर्मा

(लेखिका गीतांजलि पोस्ट की प्रधान सम्पादक हैं)