आर्थिक विकास में सहायक है भारी पानी

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डाॅ0 अमर सिंघल (जयपुुुर )

सुनने में यह बात बड़ी अजीब लगती है कि क्या पानी भी भारी अथवा हलका हो सकता है लेकिन यह बात बिल्कुल सत्य है जी हां पानी भी भारी होता है। साधारण पानी यानी हलका पानी जहां जीवन के लिये आवश्यक है, अतः अमृत तुल्य है, वहीं भारी पानी आधुनिक वैज्ञानिक युग में आर्थिक विकास के लिए विज्ञान की एक महान देन है। भारी पानी के बारे में विस्तार से जानने का मौका कैगा (कारबार) कर्नाटक में पत्रकारों के लिये 27 अगस्त 2018 से 30 अगस्त 2018 तक आयोजित ‘परमाणु ऊर्जा: जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि’ विषय पर चार दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने के दौरान ‘भारी पानी बोर्ड’ के चेयरमैन एवं मुख्य कार्यकारी तथा मूर्धन्य वैज्ञानिक डाॅ0 यू0 कमाची मुदली के भारी पानी पर अभिभाषण से मिला। उन्होंने भारी पानी के उत्पादन और उपयोग पर विस्तार से प्रकाश डाला।
आज औद्योगिक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति के लिये ऊर्जा की आवश्यकता है। भारत में ऊर्जा क्षेत्र विकास के महत्वपूर्ण मोड़ पर है। बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ क्लीन और ग्रीन ऊर्जा की महती आवश्यकता है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है, ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। आधुनिक युग में ऊर्जा के परम्परागत साधन सीमित हैं, वहीं केवल अक्षय ऊर्जा से इस बढ़ी हुई मांग को पूरा करना असंभव है। अतः परमाणु ऊर्जा आधुनिक युग में ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण विकल्प है। परमाणु ऊर्जा संयत्रों में शीतलक और मंदक के रुप में भारी पानी की आवश्यकता होती है। देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की सफलता के लिये भारी पानी उत्पादन एक महती आवश्यकता है।
भारी पानी का उपयोग मुख्य रुप से परमाणु संयंत्रों में होने वाली नाभिकीय विघटन संक्रियाओं के दौरान उत्पन्न न्यूट्रोनों को अवशोषित करने के लिये शीतलक एवं मंदक के रुप में किया जाता है जिससे नाभिकीय ऊर्जा का नियंत्रित एवं शांतिपूर्ण उपयोग किया जा सकता है।
साधारण पानी  की रचना हाइड्रोजन के दो परमाणुओं और आॅक्सीजन के एक परमाणु से होती है। हाइड्रोजन के भी तीन रुप होते हैं। ये क्रमशः साधारण हाइड्रोजन, ड्यूटेरियम और ट्राइटियम कहलाते हैं। हाइड्रोजन के इन विभिन्न रुपों को समस्थानिक (आइसोटाॅप) कहते हैं। इसी तरह आॅक्सीजन के भी तीन आइसोटाॅप हैं। हाइड्रोजन के तीनों आइसोटाॅप्स का परमाणु क्रमांक 1 है यानि उनके नाभिकों में एक प्रोटान पाया जाता है और उनके चारों ओर कक्ष में 1-1 इलेक्ट्राॅन चक्कर लगाते हैं। जहां साधारण हाइड्रोजन में कोई न्यूट्रोन नहीं होता है तथा केवल एक प्रोटाॅन होता है। वहीं ड्यूटेरियम में 1 प्रोटाॅन के साथ 1 न्यूट्रोन होता है। ट्राईटियम में एक प्रोटाॅन के साथ दो न्यूट्रोन होते हैं। इसी कारण से हाइडोजन के इन तीनों रुपों के परमाणु भार भिन्न-भिन्न होते हैं। आॅक्सीजन के तीनों रुपों का परमाणु क्रमांक 8 है और उनके परमाणु भार 16, 17 और 18 हैं। प्रोट्रोन और न्यूट्रोन के भार क्रमशः 1.0078 और 1.0084 हैं। वहीं इलैक्ट्रोन का भार 0.00054 यानि लगभग नगण्य है। अतः साधारण हाइड्रोजन में जहां एक प्रोटान होने और ड्यूटेरियम में 1 प्रोट्रोन और 1 न्यूट्रोन होने से उसका भार लगभग दो गुना हो जाता है।

सामान्य हाइड्रोजन और आॅक्सीजन से बनने वाले पानी से हम भली भांति परिचित हैं लेकिन जब यह ड्यूटेरियम के दो परमाणु और आॅक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर बनता है तो D2O यानि ड्यूटेरियम डिप्लीटेड वाटर या भारी पानी कहलाता है।
यह भारी पानी हाइड्रोजन के आइसोटोप ड्यूटेरियम का आॅक्साइड है। सामान्य जल को रसायन शास्त्र की भाषा में हाइड्रोजन आॅक्साइड कहा जाता है। जबकि भारी पानी D2O कहलाता है। साधारण पानी के 6000 भागों में एक भाग पानी का होता है। सामान्य पानी से इसके गुणधर्म कई अर्थों में भिन्न होता है –
(1) जहां साधारण पानी 100℃ पर उबलता है और 00℃  पर बर्फ बन जाता है, वहीं भारी पानी 101.420℃ पर उबलता है और 3.8020℃ पर जमता है।
(2) जहां साधारण पानी का अपेक्षित घनत्व (20℃ ) पर 0.9982 होता है। वहीं भारी पानी का अपेक्षित घनत्व 1.1050 होता है।
(3) जहां साधारण पानी की विशिष्ट उष्मा 1.00 (20℃) पर 100 होती है। वहीं भारी पानी की विशिष्ट उष्मा 1.018 होती है।
(4) भारी पानी का जीवों के शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जलीय पौधों और जीवों के शरीर के विकास में भारी पानी बाधक होता है।
(5) भारी पानी में बीजों का अंकुरण सम्भव नहीं है।

भारत में भारी पानी के उत्पादन का दायित्व परमाणु ऊर्जा विभाग की संघटक इकाई ‘भारी पानी बोर्ड’ पर है। भारी पानी दो तरह की उत्पादन प्रक्रियाओं से उत्पादित किया जाता है  H2S-H2Oहाइड्रोजन सल्फाइड जलविनिमय प्रक्रिया और दूसरी NH3-H2विनिमय प्रक्रिया। यह दोनों ही जटिल रासायनिक प्रक्रियाएं हैं और भारत को दोनों में ही महारत हासिल है। NH3-H2विनिमय प्रक्रिया पर आधारित संयंत्रों में संशलेषण गैसों की आवश्यकता होती है और संशलेषण गैसों की आपूर्ति के लिये इन्हें अमोनिया उर्वरक संयंत्रों से संबद्ध किया जाता है। भारी पानी बोर्ड देश में सात भारी पानी संयंत्रों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है। कोटा एवं मुणुगुरु के संयंत्र, जहां हाइड्रोजन सल्फाइट जल विनिमय यानि H2O-O2Oप्रक्रिया पर आधारित हैं। वहीं बड़ौदा तालचेर, तूतीकोरिन, थाल एवं हजीरा में अमोनियम -हाइड्रोजन विनिमय प्रक्रिया यानि NH3-H2विनिमय प्रक्रिया पर आधारित संयंत्रों की स्थापना की गई है।

भारी पानी का उपयोग –
परमाणु भट्टियों में शीतलक एवं मंदक के रुप में भारी पानी की आवश्यकता होने के कारण हर देश अपने परमाणु कार्यक्रम को संचालित करने के लिये भारी पानी प्राप्त करना चाहता है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में यूरेनियम अथवा प्लूटोनियम जैसे ईंधन को न्यूट्रोनों द्वारा तोड़ककर अपार शक्ति उत्पन्न की जाती है। परमाणु विखंडन के दौरान एक न्यूट्रोन जब यूरेनियम के नाभिक को तोड़ता है, तो उससे 2-3 न्यूट्रोन और निकलते हैं, जो अन्य नाभिकों को तोड़ते हैं एवं ऊर्जा भी उत्पन्न करते हैं। ये न्यूट्रोन काफी तीव्र गति वाले होते हैं। इनकी गति को मंद करने पर ही यूरेनियम के नाभिकों का विखंडन सम्भव होता है। अतः भारी पानी का उपयोग इनकी गति मंद करने के लिये किया जाता है।

सन् 1942 में एनरिको फर्मी ने शिकागो विश्वविद्यालय में विश्व की जो पहली परमाणु भट्टी बनाई थी, उसमें न्यूट्रानों की गति को धीमा करने के लिए मंदक के रुप में ग्रेफाइट की छड़ों का प्रयोग किया था। आगे जाकर यह ज्ञात हुआ कि मंदक के रुप में साधारण भारी पानी अथवा वोरेलियम का भी उपयोग किया जा सकता है लेकिन एक उत्कृष्ट मंदक के रुप में भारी पानी सबसे बेहतर विकल्प है। तब से सम्पूर्ण विश्व में इसे प्राप्त करने की होड़ लग गई।

भारी पानी पर आधारित पहली परमाणु भट्टी कनाडा में बनाई गई। भारत में 18 ‘दाबित भारी पानी’ रिएक्टर परिचालित हैं जिनसे से 4780 मेगावाट विद्युत का उत्पादन हो रहा है। इन रिएक्टरों में मंदक एंव शीतलक के रुप में भारी पानी प्रयुक्त होता है। भारी पानी के उत्पादन की दिशा में भारत ने पर्याप्त सफलताएं हासिल की हैं।
प्रकृति में यूरेनियम के विभिन्न रुपों की प्रतिशत मात्रा निम्न प्रकार है –
यूरेनियम-238 99.3 प्रतिशत
यूरेनियम-235 0.7 प्रतिशत
यूरेनियम-233 0.008 प्रतिशत
प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि यूरेनियम 238 के परमाणुओं के विखण्डन के लिये अधिक ऊजाशील न्यूट्राॅनों की आवश्यकता होती है। वहीं यूरेनियम 235 के परमाणु विखण्डन कम ऊर्जावान न्यूट्राॅन भी कर सकते हैं और उस विखण्डन से अधिक ऊर्जा भी उत्पन्न होती है। सामान्यतः परमाणु संयंत्रों में प्राकृतिक या उन्नत यूरेनियम जिसमें यूरेनियम-235 की मात्रा अधिक होती है को ईधन के रुप में काम में लाया जाता है। मंदक के रुप में भारी पानी के प्रयोग का यह फायदा होता है कि भारी पानी के उपयोग करने पर उन्नयित यूरेनियम की आवश्यकता नहीं होती है अधिक यूरेनियम आॅक्साइड से ही ऊर्जा उत्पादन किया जा सकता है क्योंकि यूरेनियम संवर्द्धन एक जटिल एवं घातक प्रक्रिया है। भारी पानी का उपयोग परमाणु ऊर्जा प्रक्रिया को कम खर्चीली एवं सुरक्षित बनाता है जिससे यह विकिरण की संभावनाओं को कम करता है।

पश्चिमी देशों में इसका उपयोग पिछले एक दशक से कैंसर रोग के निदान में किया जा रहा है। भारी जल कैंसर निदान थैरेपी, कीमो और रेडियेशन थैरेपी से होने वाले साइड इफैक्ट्स से भी मुक्त है। भारी पानी का उपयोग चर्म रोगों की चिकित्सा एवं मानव के डीएनए के दोषों को दूर करने में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। जिससे हृदय रोग, मधुमेह और थैलिसीमिया जैसे असाध्य रोगों का निदान सम्भव हुआ है।
चिकित्सकीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तीन माह तक एक निश्चित मात्रा में भारी जल का सेवन किया जाये तो यह व्यक्ति की आयु में वृद्धि करता है तथा डीएनए के दोषों को दूर करने में कारगर सिद्ध होता है।

ड्यूटेरियम का उपयोग लो वाटर पीक आप्टीकल फाइबर के निर्माण में भी होता है जोकि सूचना तकनीकी के क्षेत्र में वरदान साबित हुआ है। D2का उत्पादन करके आॅप्टीकल फाइबर निर्माताओं को इसकी आपूर्ति की जाती है। भारी पानी बोर्ड ने पर्यावरण सुरक्षा के लिये फ्लू गैसों से एसपीएम को घटाने की कार्यक्षमता सुधारने की तकनीकी भी विकसित की है तथा इसे पेटेंट भी कराया है। यह कोयला आधारित बिजलीघरों की एसपीएम घटाने तथा ईएसपी की कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु सबसे उपयुक्त है।

भारी पानी उत्पादन में भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर है अपितु यह भारी पानी का निर्यात अमेरिका, फ्रांस, कोरिया आदि जैसे देशों को करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर देश के आर्थिक विकास में योगदान कर रहा है। भारी पानी रेडियो धर्मी भी नहीं है अतः यह विकिरण रहित होने से हानिकारक भी नहीं है। भारी पानी का उपयोग ड्यूटेरीकृत विलायकों में भी होता है। ड्यूटेरीकृत क्लोरोफार्म आदि कुछ कार्बनिक विलायकों में भारी पानी की आवश्यकता होती है। भारी पानी यानि ड्यूटेरियम स्विच औषधियां अधिक स्थाई होती हैं और डोज में कमी लाती हैं। यह औषधियां सम्पूर्ण जीवन अवधि तक अधिक प्रभाव शरीर में डालती हैं। जहां परम्परागत औषधियांे को समय के साथ-साथ अधिक डोज की जरुरत होती है, वहीं ड्यूटेरियम स्विच औषधियों में समय के साथ-साथ कम डोज की आवश्यकता होती है। इनमें बायो कचरा भी सामान्य औषधियों की तुलना में कम होता है। ड्यूटेरिकृत स्विच औषधि में साइड्इफेक्ट भी परम्परागत औषधियों की तुलना में कम होते हैं। भारी पानी का उपयोग जैव सामग्री के ताप स्थिरीकरण में भी किया जाता है। चूंकि यह पानी अधिक तापमान पर ही उबलता है। अतः यह ओरल पोलियो वैक्सीन के ताप स्थिरीकरण में भी काम में लिया जाता है क्योंकि ड्यूटेरिीकृत वैक्सीन अधिक समय तक एक निश्चित तापमान पर सुरक्षित बनी रहती है। इसके अतिरिक्त भारी पानी, इलैक्ट्रोनिक्स, लेजर तकनीकी आॅप्टीकल रिकाॅर्डिंग, आइसोटोप हाइड्रोलोजी और जीवन विज्ञान में उपयोगी सिद्ध हुआ है। अभी हाल में चिकित्सकीय उपयोग हेतु रेडियो आइसोटोप बनाने में उपयोगी कोलकाता में देश के सबसे बड़े साइक्लोट्रोन – साइक्लोन-30 ने काम शुरु कर दिया है। साइक्लोन-30 अगले वर्ष के मध्य तक चिकित्सा के लिये प्रयोग किये जाने वाले रेडियो आइसोटोप का उत्पादन करेगा। जिनका प्रयोग ब्रेस्ट कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर जैसे रोगों के निदान और उपचार में किया जायेगा।

भारी पानी बोर्ड द्वारा स्थापित 7 भारी पानी संयंत्र परमाणु विद्युत उत्पादन और अनुसंधान रिएक्टरों की भारी पानी सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में ही सक्षम नहीं है, अपितु इनकी बदौलत देश भारी पानी उत्पादन में आत्म निर्भर हो गया है। भारी पानी का ग्रे्रड उच्च करने की प्रौद्योगिकी का विकास भी भारतीय वैज्ञानिकों ने कर लिया है। भारत अब विश्व का सबसे बड़ा भारी पानी उत्पादक देश है जोकि भारी पानी का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर देश के विर्निमाण में योगदान कर रहा है।

 

डाॅ0अमर सिंघल, वरिष्ठ पत्रकार ( संपादक दैनिक संचार क्रांति , जयपुुुर )