इस शहर का रावण 180 साल से है खामोश, दशहरे वाले दिन भी नहीं मरता

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गीतांजलि पोस्ट (मुकेश पारीक)

बिसाऊ(झुंझुनू)। जहां सभी रामलीला मे अहंकार में चूर होकर रावण अपनी तेज ओर डरावनी आवाज मे दहाडता है । रावण के साथ साथ लंका के राक्षसो की आवाज इतनी तेज होती है कि दूर-दूर तक उनकी गूंज सुनाई देती है । मगर बिसाऊ के मूक रामलीला का रावण ऐसा नहीं है । यह बोलता नही बल्की मूक बना रहता है। हां ये जरूर है कि सब कार्य उसी प्रकार करता है जिस प्रकार सभी रामलीला मे रावण करते है लेकिन यह रावण करता है खामोशी के साथ ओर मूक बनकर । तो वही मर्यादा पुरूषोत्तम  रामचन्द्र की मधुर आवाज भी इस रामलीला मे नही सुनाई देती ना ही अयोध्या के भजन सुनाई देते है ओर ये सिलसला लगातार पिछले 180 साल से भी अधिक समय से मूकरामलीला के रूप मे चला आ रहा है। जी हां हम बात कर रहे झुंझुनू जिले के बिसाऊ कस्बे में होने वाली मूक रामलीला की जो अपने आप मे एक अनुठी तो है ही साथ ही इनके पात्र व उनके रामलीला का मंचन भी अपने आप मे अनौखा है ।

देशभर में हो रही रामलीलाओं की बात करे तो झुंझुनू जिले के बिसाऊ मे हो रही मूक रामलीला का इतिहास को खंगाला जाये तो कई रोचक जानकारियां सामने आती है। बिसाऊ की मूक रामलीला देशभर मे ही नही अपितु पूरे संसार में होने वाली सभी रामलीलाओं से इसलिए अलग है, क्योंकि इसके मंचन के दौरान सभी पात्र बिन बोले (मूक बनकर) ही सब कह जाते हैं। यही नही इनके सभी पात्र अपने मुखौटो से अपनी पहचान दर्शाते है ना की बोल कर। यही कारण है कि इसको मूक रामलीला के नाम से जाना जाता है। इस तरह की रामलीला का मंचन पुरे संसार मे अन्य कही नहीं होती। यही कारण है कि यह अपने-आप मे सबसे अनुठी व अनौखी रामलीला है। मूक रामलीला की शुरुआत रामाणा जोहड़ से हुई। फिर इसका मंचन गुगोजी के टीले पर होने लगा। बाद में काफी समय तक स्टेशन रोड पर हुई। वर्ष 1949 से गढ ़के पास बाजार में मुख्य सड़क पर लीला का मंचन शुरू हुआ, जो वर्तमान में जारी है।


यदि मूक रामलीला के कब से शुरू होने के पीछे की कहानी की बात करे तो इसके बारे मे अलग तथ्य सामने आते है कुछ का कहना है यह 200 साल पुरानी है तो कुछ 180 साल पहले शुरू होना बताते है। वही इस बारे मे इतिहासकार त्रिलोकचन्द शर्मा से पुछा गया तो उनके अनुसार यह रामलीला लगभग 180 साल पहले जमना नाम की एक साध्वी के द्वारा बिसाऊ के रामाण जौहडा से शुरूआत करना बताया। साध्वी जमना ने गांव के कुछ बच्चों को एकत्रित कर  रामाणा जोहड़ में रामलीला का मंचन शुरू किया। हाथ से उनके पात्र के मुताबिक मुखोटे बनाए गए, लेकिन मुखोटे पहनने के बाद बच्चों को संवाद बोलने में दिक्कत होने लगी तो उनसे मूक रहकर ही अपने पात्र की भूमिका निभाने को कहा गया और इस प्रकार बिसाऊ में मूक रामलीला की शुरुआत हुई, जो आज तक जारी है।
इस लीला की खास बात यह है कि यह शुक्ला प्रथम से पूर्णिमा तक चलती है। वही इस लीला मे रावण दशहरे वाले दिन नही मरता बल्की चतुरदर्शी को मरता है ओर यहां की रामलीला में विजयादशमी की बजाय चतुर्दशी यानी दशहरे के चार दिन बाद रावण दहन होता है। साथ ही मूक रामलीला का मंचन आसोज शुक्ला प्रथम से पूर्णिमा तक 15 दिन तक होता है।
यह लीला अपने आप मे साम्प्रदाय शौहार्द के प्रतिक मे भी जानी जाती है। त्रिलोक चन्द शर्मा कि माने तो लीला का मंच ढोल-नगाडो पर होती है जो स्थानिय मुस्लिम समुदाय के ईल्लाही लोगो के द्वारा बजाया जाता है। जंहा लगभग सभी रामलीला मे अमूमन हर दिशाओं में लाउड स्पीकर लगाए जाते हैं, मगर यहां एक भी लाउड स्पीकर नहीं लगाया जाता है। सभी पात्र अपना अभिनय मूक रहकर ही करतेहैं। खास बात तो यह है कि रामलीला का मंच ही नहीं होता। पूरी रामलीला का मंचन खुले मैदान पर ही होता है।
लीला मे पंचवटी व लंका की बनावट मैदान के उत्तरी भाग में काठ (लकडी) की बनी हुई अयोध्या व दक्षिण भाग में सुनहरे रंग की लंका तथा मध्य भाग में पंचवटी रखी जाती है। मैदान में बालू मिट्टी डालकर पानीका छिड़काव किया जाता है। लीला शुरू होने से पहले चारों स्वरूप रामलीला हवेली से पहले घोड़ों पर बैठकर आते थे लेकिन अब वाहन में बैठकर आते हैं।


लीला के पात्रों की पोशाक भी अलग तरह की होती है। अन्य रामलीला की तरह शाही एवं चमक दमक वाली पोशाक न होकर साधारण पोशाक होती है। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की पीली धोती, वनवास में पीलाकच्छा व अंगरखा, सिर पर लम्बे बाल एवं मुकुट होता है। मुख पर सलमें-सितारे चिपका कर बेल-बूंटे बनाए जाते है। हनुमान, बाली-सुग्रीव, नल-नील, जटायू एवं जामवन्त आदि की पोशाक भी अलग अलग रंग की होतीहै। सुन्दर मुखौटा तथा हाथ में घोटा होता है।
रावण की सेना काले रंग की पोशाक में होती है। हाथ में तलवार लिए युद्ध को तैयार रहती है। मुखौटा भी लगाया हुआ होता है। आखिरी चार दिनों में कुम्भकरण, मेधनाथ, नारायणतक एवं रावण के पुतलों का दहनकिया जाता है। फिर भरत मिलाप के दिन पूरे नगर में श्रीराम दरबार की शोभा यात्रा निकाली जाती है।


इस मूक रामलीला को देखने के लिये अप्रवासी भारतीयो के साथ साथ काफी संख्या मे शैलानीयो का भी आना इस रामलीला की खासियत है।