ये उन दिनों की बात है…

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नहीं सांच को आंच थी, नहीं था व्यभिचार।
बात-बात का मोल था, सुखमय था घर-बार।।

आंखों में अंदाज था,दिल में था आभार।
सब रिश्तों में प्रेम था,अपना था संसार।।

घर-घर दीपक प्रेम के, जलते थे हर ओर।
सब खुशियों में खेलते, ना ही थे मन- चोर।।

बड़े थे बंधन प्रेम के,तब छोटे थे पाप।
अब मतलब का जोर है, नहीं रहा अपनाप।।

ये तो तब की बात है,जब थी हर-मन सांच।
सुख में चाहे एक हो, रहते दुख में पांच।।

अपनेपन की भावना,भरी हुई हर बात।
हंसी-खुशी दुख बांटती, पनघट सखियां सात।।

चलती शीतल पावनी,महक हवा मुसकाय।
करती बातें पेड़ से,ताली पात बजाय।।

मीठे जल की गागरी, रखी हुई हर द्वार।
पीये प्यास बुझती सदा, तपे जेठ या क्वार।।

घूंघट में चंदा वदनी, बिजली जैसी नार।
मधुर बोल मन मोहते,झर-झर झरता प्यार।।

“दीप” देहरी सांझ को,जलता सारी रात।
रंगरसिया रस प्रेम की, खतम न होती बात।।

“मौज” ये तब की बात है,जब थे अपने गांव।
प्रीत बरसती बादली, नीम-पीपली  छांव।।

विमला महरिया “मौज”