लोकतंत्र का उत्सव और जनमानस के मत की उपयोगिता

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Geetanjali Post… (संजय शर्मा)
वर्तमान में देश के 5राज्यों में लोकतंत्र के महापर्व की उठापठक जारी है। सभी दल लोकलुभावन वादों और घोषणाओं के साथ जनता के बीच आ रहे हैं और देश की भोली जनता पिछले वादों ओर मूल समस्याओं से दूर तात्कालिक लाभ के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुन अपने आगामी 5साल उसे सौंपने को बेकरार है बड़ा प्रश्न ये है कि क्या जो वोट सरकारों को बना अथवा बिगाड़ने की क्षमता रखता है क्या उसकी कीमत मात्र छोटे छोटे प्रलोभन में सिमट कर रह गयी है ।जिस दौर में जाति देखकर रिश्तेदारी नही होती उस दौर में क्या हम जातिवाद के आधार पर देश और राज्य में अपने प्रतिनिधि भेजने को ही वास्तविक लोकतंत्र मान बैठे हैं । अपने मत की वास्तविक कीमत को पहचानकर आज के इस दौर में सभी तात्कालिक प्रलोभनों से दूर,जातिवाद और भाई भतीजावाद से परे लोकतंत्र के इस महायज्ञ में सही उम्मीदवार के पक्ष में अपनी मत रूपी आहुति देकर इस लोकतन्त्र को मजबूती प्रदान करेंगे तो ही हमारा ओर देश का भविष्य विकासवादी और सुदृढ़ हो पायेगा ।मतदान के दिन को अवकाश के रूप में उपभोग करने से हमारे मतदान के वास्तविक कर्तव्य से हम दूर भागने के पश्चात हमे अपने अधिकारों की आवाज उठाने का भी कोई हक नही रह जाता । नशे में, प्रलोभन में,निजी स्वार्थ में आकर मतदान करना ओर मतदान से दूर रहना ये लोकतंत्र की हत्या करना ही है स्वविवेक से मतदान अवश्य करें ।