औरत होना हर हाल में हैं दो पाटों के बीच पिसना

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” लडकी या महिला या पुरूष द्वारा एकल परिवार एक ऐसी पहल है जिसकी इजाजत घर-परिवार और समाज दोनों ही नहीं देते क्योंकि हमारे भारतीय समाज में लड़का हो या लड़की दोनों का आखरी पड़ाव शादी ही माना जाता हैं “।

औरत होना यानी हर हाल में दो पाटों के बीच पिसना हैं, यह कोई मजाक या पुरानी बात नहीं हैं बल्कि आज की कामकाजी महिलाओं कि व्यथा हैं। समाज में बदलाव, रहन-सहन परिवर्तन, महिला शिक्षा में बढावे इत्यादी से धीरे-धीरे शिक्षा का स्तर बढ़ते लगा हैं जिसके कारण स्कूल समय से ही लडकियां अपने भविष्य के सपने बुनने लगती हैं ओर लडकों के जैसे अपने केरियर के विषय में सोचने लगती हैं और शिक्षा पूरी होने तक उनमें नौकरी या स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने की इच्छा अंकुरित होने लगती हैं यही कारण हैं कि वह शादी के पश्चात घर की जंजीरों में कैद नहीं होना चाहती।

दो पाटों के मध्य पिसती जिन्दगी-वर्तमान समय में शादी के बाद भी महिलाओं को घर-परिवार, समाज द्वारा नौकरी या स्वय का व्यवसाय करने की इजाजत दे दी हैं जिससे अब वह घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों को संभालने लगी हैं। इस दोहरी जिम्मेदारी सम्भालते को हुए उसे अपने ऑफिस और अपने घर के मध्य तालमेल बैठना पडता हैं जिसके कारण ऑफिस में अक्सर उसे यह कहकर नीचा दिखाते हैं कि यदि बच्चे और घर परिवार की इतनी फिक्र है तो घर ही बैठना था नौकरी करने की क्या आवश्यकता थी और घर पर यह ताना दिया जाता है कि अपनी मर्जी से काम कर रही हो हमारे ऊपर कोई एहसान नहीं करती, अपने पति और अपने बच्चों के लिए कमाती हो, इसलिए रौब दिखाने की या साहिबगिरी झाडऩे की जरूरत नहीं है, औरत हो औरत के तरीके से ही रहना होगा, मर्द बनने की कोशिश करने की आवश्यकता नहीं है। यह किसी एक कि नहीं बल्कि अधिकतर कामकाजी महिलाओं की व्यथा हैं।

घेर लेती हैं बिमारिया-नोकरीपैशा महिलाओं को शादी के बाद घर, बच्चे, पति के साथ-साथ उसे अपनी नोकरी या अपने बिजनेस को भी समय देना होता हैं जिसके कारण वह अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाती और मानसिक, शारीरिक बिमारियों से घिर जाती हैं वही दूसरी और पुरुषों की दिनचर्या में शादी के बाद भी कोई ज्यादा परिवर्तन नही आता।

क्या कारण हैं एकल परिवार का-अपने सपनों को पूरा करने के लिये कुछ लडकियां शादी नहीं करती तो कुछ महिलाओं की शादी किन्ही कारणों से टूट जाती हैं और वे अपने जीवन को पति और बच्चों के अलावा भी देखती हैं साथ ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के कारण वह एकल जीवन बसर करने का सोच लेती हैं और अकेले रहती हैं। इसके अलावा अधिकतर विधवा, परित्यगता महिलाए भी दुबारा शादी नहीं करके अकेले जीवन बसर करने का मानस बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर नोकरीपेशा महिलाओं की दौहरी जिम्मेदारी एंव उनकी व्यथा को देखकर आज लड़कियां शादी के बंधन से ही कतराने की लगी हैं क्योंकि वह समाज में देखती हैं कि किस प्रकार शादी करने के बाद एक महिला को अपने कार्यस्थल, अपने में बदलाव करते हुए अपनी जिंदगी बसर करनी पडती हैं, साथ ही लोगों के ताने भी सुनने पडते हैं।

क्या आसान हैं एकल जीवन-आज समय में बदलाव के साथ एकल परिवारों कि संख्या बढने लगी हैं हांलाकि एकल परिवार में महिला और पुरूष दोनों को परेशानियों का सामना करना पडता हैं लेकिन पुरूषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा परेशानिया झेलनी पडती हैं क्योंकि समाज महिला की इस स्वच्छंदता को चरित्रहीनता से जोड़कर देखने लगता है और यह दुहाई देता है कि यह हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति के विपरीत आचरण हैं जिसकी इजाजत घर-परिवार और समाज दोनों ही नहीं देते क्योंकि हमारे भारतीय समाज में लड़का हो या लड़की दोनों का आखरी पड़ाव शादी ही माना जाता हैं। यानि शादीशुदा होना चरित्रवान होने का सर्टिफिकेट मान लिया जाता है। ऐसे में यदि स्त्री का कोई पुरुष मित्र है तो संदेश को यकीन का जामा अविलंब पहना दिया जाता है।सवाल पूछती हुई निगाहें हर वक्त उसका पीछा करती रहती हैं कभी-कभी तो उसे बिना कहे ही चरित्र हनन की मुहर लगा दी जाती है।

” वर्तमान समय में महिलाएं समाज की कानाफूसी की परवाह किये बिना, चुनौतियों का सामना करती हुई अपनी मंजिल की और बेखौफ होकर आगे बढ रही हैं, कायदे-कानूनों में बंधने की बजाय अपनी एकल जिंदगी जी रही हैं, वह अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं और अपनी जिंदगी अपने काम से खुश भी है और संतुष्ट भी हैं “।

 

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र