बदल गया हैं रूप किवाड़ का

0
181

क्या आपको पता है कि किवाड़ की जो जोडी होती है,
उसका एक पल्ला स्त्री और,दूसरा पल्ला पुरुष होता है।

ये घर की चौखट से जुडे-जुडे रहते हैं।
हर आगत के स्वागत में खडे रहते हैं।
खुद को ये घर का सदस्य मानते हैं।
भीतर बाहर के हर रहस्य जानते हैं।।
एक रात उनके बीच था संवाद,
चोरों को दिया था ंलाख-लाख धन्यवाद।
वर्ना घर के लोग हमारी, एक भी चलने नहीं देते।
हम रात को हम मिल तो जाते हैं,
हमें ये मिलने भी नहीं देते।
घर की चौखट से साथ हम जुडे हैं,अगर जुडे-जुड नहीं होते
तो आता जब तेज आंधी-तूफान
तुम कहीं, हम कहीं और पडे होते।
चौखट से जो भी उखडा है,वो वापस कभी नहीं जुडा है।
इस घर में यह जो झरोखे ,और खिडकियाँ हैं।
यह सब हमारे लडके,और लडकियाँ हैं।
तब ही तो, इन्हें बिल्कुल खुला छोड देते हैं।
पूरे घर में जीवन रचा बसा रहे,
इसलिये ये आती जाती हवा को,
खेल ही खेल में ,घर की ओर मोड देते हैं।
हम घर की सच्चाई छिपाते हैं, घर की शोभा को बढाते हैं।
रहे भले कुछ भी खास नहीं, पर उससे ज्यादा बतलाते हैं।
घर में जब भी, शुभ काम होता है।
सब से पहले हमीं को, रँगवाते पुतवाते हैं।
पहले नहीं थी,उडोर बेल बजाने की प्रवृति।
हमने जीवित रखा था जीवन मूल्य,
संस्कार और अपनी संस्कृति।
बाबू जी जब भी आते थे,कुछ अलग सी साँकल बजाते थे।
आ गये हैं बाबूजी, सब के सब घर के जान जाते थे।
बहुयें अपने हाथ का, हर काम छोड देती थी।
उनके आने की आहट पा, कर आदर में घूँघट ओढ लेती थी।
अब तो कॉलोनी के किसी भी घर में,
किवाड़ रहे ही नहीं दो पल्ले के।
घर नहीं अब फ्लैट हैं ,गेट हैं इक पल्ले के।
खुलते हैं सिर्फ एक झटके से।
पूरा घर दिखता बेखटके से दो पल्ले के किवाड़ में,
एक पल्ले की आड में ,घर की बेटी या नव वधु,
किसी भी आगन्तुक को ,जो वो पूछता बता देती थीं।
अपना चेहरा व शरीर छिपा लेती थीं।
अब तो धडल्ले से खुलता है ,एक पल्ले का किवाड़।
न कोई पर्दा न कोई आड।
गंदी नजर ,बुरी नीयत, बुरे संस्कार एक साथ आते हैं ।
फिर कभी बाहर नहीं जाते हैं कितना बडा बदलाव हैं आया
अच्छे भाव का अभाव स्पष्ट दिखता है कुप्रभाव।
सब हुआ चुपचाप,बिन किसी हल्ले गुल्ले के।
बदल किये किवाड़,हर घर के मुहल्ले के।
अब घरों में दो पल्ले के किवाड़ कोई नहीं लगवाता।
एक पल्ली ही अब, हर घर की शोभा है बढ़ाता।
अपनों में नहीं रहा वो अपनापन।
एकाकी सोच हर एक की है ,
एकाकी मन है व स्वार्थी जन।
अपने आप में हर कोई ,
रहना चाहता है मस्त, बिल्कुल ही इकलल्ला।
इसलिये ही हर घर के किवाड़ में,
दिखता है सिर्फ एक ही पल्ला!

अरविन्द जांगिड, ठीकरिया