बस एक बलिदान…

0
22
        आज सबकुछ कितना अच्छा है , ज्योति सोचे जा रही थी ,
पापा कितने अच्छे हो गये हैं , हम सबका कितना ध्यान रखते हैं !
हम तीनों बहनों को कोई भी कमी नहीं होने देते हैं !!
         अभी थोड़ी देर पहले ही तो ज्योति की बड़ी दीदी के रिश्ते वाले , रिश्ता तय करके निकले हैं ,  आज ज्योति की आँखों से अविरल अश्रु की धारा फूट पड़ी थी , जो रोकें नहीं रुक रही थी !
आज उसको माँ की कुछ ज्यादा ही याद आ रही थी ! वो सोचे जा रही थी आज माँ होतीं तो कितनी खुश होतीं ! माँ ने कोई भी तो ख़ुशी नहीं  देखी , रोज रोज पिता जी का शराब पीकर आना और घर में कलह शुरू होना फिर गन्दी गालियों का सिलसिला जो चलता था खत्म होने का नाम ही न लेता था  , हम सभी बहनें एक कोने में डर के मारे दुबक जाती थीं , और जब सहने की इम्तहाँ हो गयी तो आखिर माँ ने एक दिन मिट्टी का तेल छिड़क आग के हवाले कर लिया , और तड़पते तड़पते हम सबको छोड़ चली गयीं हमेशा के लिए उस दुनियां में जहाँ उनसे लड़ने वाला कोई न बचा !!
             पापा ने कभी नहीं ये सोचा होगा की माँ ऐसा भी कोई कदम उठा लेंगी ! फिर पापा ऐसा बदले , उन्होंने कभी शराब को हाथ भी न लगाया और जैसे पश्चाताप में पल पल घुटने लगे , हम  बहनों का बहुत ध्यान रखने लगे , पापा का ये रूप देखने को माँ तरस गयीं थीं !!!
        काश पापा समय पर सब कुछ समझ जाते तो आज माँ भी हमारे साथ होतीं , सोचकर ज्योति दुखी मन से अपने दुसरे कामों में  लग गयीं !!!
सीमा “मधुरिमा”
लखनऊ