दान-पुण्य से ज्यादा हो गया हैं सेल्फी वाला पशु और पक्षी प्रेम

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गीतांजलि पोस्ट…धर्म की जड सदा हरी रहती है इसलिये हमारे यहां कुछ विशेष दिवस जैसे मकरसंक्रांति, एकादशी, अमावस्या इत्यादि पर दान-पुण्य करने की परम्परा सालों से चली आ रही हैं। इन विशेष दिनों में किसी जरूरत मंद की सहायता करना, किसी भूखे को खाना खिलाना, गरीब को सर्दी में कंबल बाटना या किसी की आर्थिक सहायता करना ऐसे बहुत सारे तरीके हैं जिनके द्वारा किसी गरीब की सहायता करते का काम किया जाता हैं। 14 जनवरी को मकरसक्रांति आने वाला हैं इस दिन खूब दान पुण्य किया जाता हैं क्योकि हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन दान देने दान देने का दुगुना फल मिलता हैं।

समय के साथ बदल गया हैं दान-पुण्य का तरिका-समय में बदलाव के साथ दान करने में भी बहुत बदलाव आ गया हैं जहाँ पहले दान देते वाले जहा अपने दिए हुए दान का बखान नहीं करते थे कि दिए गए दान के बारे में किसी को बताने पर दान देने का कोई फायदा नहीं होता क्योंकि हमारे यहां दान देना धार्मिक स्तर पर पुण्य का काम समझा जाता हैं। मेरी मम्मी कहती थी कि दान इस प्रकार देना चाहिए कि दाएं हाथ से दिए जाने वाले दान-पुण्य की खबर बाएं हाथ को ना हो लेकिन आज वह बात नहीं हैं आज लोग जितने का दान नहीं देते उससे ज्यादा तो दान देने का बखान करने में खर्च कर देते हैं, सहायता करते हैं 100 रुपये की और बताते हैं 1000 रूपयों का।

एन.जी.ओ. का उद्देश्य होता हैं सरकार से फंड लेना-आज अधिकतर लोगों को सोशल मीडिया पर ऐसी ही पोस्ट शेयर करते हुए देखती हूुं जिनमे ंगाय को चारा खिला रहे होते हैं, कम्बल बाट रहे होते हैं, फुटपाथ पर खाना खिला रहे होते हैं या दान-पुण्य के कोई अन्य काम कर रहे होते हैं। वही दूसरी और एन.जी.ओ. वाले अपने दिये गये दान-पुण्य की खबरें न्यूज पेपर, वेबसाइट पर लगवाने के प्रयास करते रहते हैं, खैर एन.जी.ओ. वालो का अपने द्वारा किये गए काम की मीडिया कवरेज करवाने का उद्देश्य अपने दान-पुण्य के काम को दिखा कर सरकार से फण्ड लेना होता हैं लेकिन आम इंसान अपने दान-पुण्य का बखान क्यों करता हैं यह समझ नहीं आता।

बना रहे सेल्फी वाला प्रेम- आज के समय में लोगों में दान पुण्य करने से ज्यादा फोटो मेनिया या यूं कहे कि छपास रोग ज्यादा हो गया हैं, लोग गाय को जितना चारा नहीं डालते, उससे ज्यादा तो फोटो खिंचवा लेते हैं। गाय के सामने मुहं बना बनाकर सेल्फी लेते हैं तो बेचारी गाय माता भी सोचती होगी कि यह व्यक्तिधर्म करने आया है या फोटो खिंचवाने इसी प्रकार जब कोई घायल पक्षी मिलाता हैं उसका ईलाज बाद में शुरू होता हैं पहले घायल जख्म से तडफते, मूक, बधिर, मासूम के साथ फोटो सैशन किया जाता हैं, फिर शुरू होता हैं लिये गये फोटों को फेसबुक, वाटस्अप, टिवट्र, इंसटाग्राम इत्यादी पर शेयर करने का दौर जैसे वो सभी को बता रहे हों कि मैंने 10-20 रूपए का चारा डालकर, किसी का ईलाज करवाकर पशुप्रेमी होने का अवार्ड़ ले लिया हैं वहीं दूसरी ओर जख्म से तडफते मूक, बधिर, मासूम इंतजार करते रहे कि कब उन्हें ईलाज मिलेगा।

हालांकि यह भी सही है कि गौ माता की सेवा होनी चाहिए और फोटो के चस्के से कम से कम कुछ तो धर्म हो रहा हैंच यदी यह दिखावा करने वाले धर्मप्रेमी रोजाना गौमाता की सेवा का संकल्प लें तो सडकों पर गौमाता काल का ग्रास नहीं बनगी और ना ही ईलाज के अभाव में किसी जानवर की जान जायेगी। भगवान करें फोटो और सेल्फी प्रेमियों का पशु और पक्षी प्रेम केवल एक दिन के लिए नहीं हमेशा के लिए बना रहे।

जरूरत मन्द को विशेष फायदा नहीं होता विशेष दिन दान लेने से-एक बात और है हमारे यहां कुछ विशेष दिन दान के लिए बताये गए हैं उस दिन लोग दान-पुण्य का काम करते हैं उससे कोई फायदा नहीं होता बल्कि अति हो जाती हैं। इसका उदाहरण मकर सक्रांति ही लेते हैं शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन दान देने दान देने का दुगुना फल मिलता हैं इसी कारण इस दिन लोग गायों को चारा खिलाना, गरीबों को आवश्यक समान देना, भूखों को खाना खिलाना इत्यादि ददान-पुण्य का काम करते हैं। जब सारे लोग एक दिन गाय को चारा डालते हैं तो गौशाला में बहुत चारा जमा हो जाता हैं जिसे एक दिन में पशु से नही खाया जाता और वह खराब हो जाता है, गरीबों को खाना खिलाते हैं तो वह भी व्यर्थ जाता हैं क्योंकि इंसान की लिमिट होती हैं वह अपनी सामर्य के अनुसार ही खाना खा सकता हैं ज्यादा नही खा सकता ऐसे में खाना भी व्यर्थ जाता हैं। इसी प्रकार जब एक दिन जरूरत का सामान दान में दिया जाता हैं वह भी आवश्यकता से ज्यादा हो जाता हैं।

यहां बात दान-पुण्य देने की या उसके समय की नहीं है बल्कि दिए जाने वाले दान-पुण्य की जरूरत की हैं। किसी को जरूरत के समय देना चाहिए इसके लिए किसी पर्व, विशेष दिन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए बल्कि उस समय दान-पुण्य देना चाहिए जब किसी को उसकी जरूरत होती हैं तभी सही मायने में दान देने की सार्थकता होती हैं।

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र