लुभालेती हैं अनोखी अलबेली सुंदर इमारतें

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गीतांजलिपोस्ट (डॉ. प्रभात कुमार सिंघल,कोटा)

    भारत आने वाले पर्यटक आगरा का ताजमहल देखने जरूर जाते हैं। ताजमहल की खूबसूरती निश्चित ही चकाचोंध कर देने वाली है। ताजमहल के साथ आगरा का लाल किला,जामा मस्जिद, दयाल बाग़ का कारीगरी पूर्ण मंदिर, सिकंदरा में अकबर का मकबरा और आगरा के पास फहतेहपुर सीकरी की खूबसूरत इमारतें भी आपका मन मोह लेंगी। आप भी जानिए अनोखी अलबेली सुंदर इमारतों की कहानी।

लाल किला

 

        लाल किलाशहर के बीचोबीच स्थित लाल किला अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण विश्व धरोहर स्थल में शामिल है। किले का निर्माण मुगल शासक अकबर द्वारा 1565 ई. में करवाया गया था एवं बाद में शाहजहां द्वारा इस किले का जीर्णाद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया एवं किले को महल में बदल दिया। यहां संगमरमर एवं पीट्रा डयूरा नक्काशी का सुन्दर कार्य किया गया है। यह किला चन्द्राकार आकृति में बना है  किले की परिधि 2.4 कि.मी. है तथा किलेनुमा चार दीवारी दोहरे परकोटे युक्त है। दीवार में बुर्जियां बनी हैं। जिन पर सुरक्षा छतरियां बनाई गई हैं। दीवार को 9 मीटर चौड़ी एवं 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है। किले की प्रमुख इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहांगीर महल, खास महल, शीश महल तथा मुसम्मन बुर्ज आते हैं। यह किला मुगल स्थापत्य कला का एक जीवन्त उदाहरण है। लाल किले की विशेषता यह है कि यहां के झरोखों से ताजमहल का रमणीक दृश्य दिखाई देता है।

जामा मस्जिद

          जामा मस्जिदआगरा किले के समीप बनी जामा मस्जिद लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बनी है, सजावट में दर्शनीय है। यह मस्जिद विशेष रूप से मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेटी जहांआरा के लिए बनवाई थी। नक्काशी दार मेहराब, मुख्य कक्ष और दो कमरे बने हैं। मस्जिद एक ऊंचे चबूतरे पर बनाई गई हैं। मस्जिद के तीन विशाल गुम्बद उलटे कमल और कलश के साथ बनाए गये है। इस  मस्जिद में 10 हजार लोग एक साथ इबादत कर सकते हैं।आगरा किले के परिसर में उत्तर-पश्चिमी कोने पर नगीना मस्जिद अथवा रत्न मस्जिद स्थित है इसे 1631-40 के मध्य शाहजहां ने बनवाया था। मस्जिद का मुख्य प्रार्थना हॉल सफेद संगमरमर से बना है। मस्जिद में तीन गुम्बद और मेहराबे दर्शनीय हैं। यह मस्जिद 10.21 मीटर चौड़ी और 7.39 मीटर गहरी है। शाही परिवार की यह एक निजी मस्जिद के रूप में बनवाई गयी।

 एतमादुद्दौला का मकबरा –

           एतमादुद्दौला मकबरे का निर्माण नूरजहां ने 1622 से 1628 ई. के मध्य अपने पिता की स्मृति में करवाया था। उसके पिता घियासुद्दीन जहांगीर के दरबार में मंत्री थे। मुगल समय के बनाये गये अन्य मकबरों की तुलना में यह छोटा मकबरा है। इसे श्रृंगारदान भी कहा जाता है। इसकी कला एवं शिल्प ताजमहल से मिलती-जुलती है। यहां पर आयताकार उद्यान भी बने हैं।

दयालबाग

        दयाल बागआगरा में स्थित दयाल बाग एक धार्मिक दर्शनीय स्थल है। जिसे स्वामी बाग भी कहा जाता है यहां स्वामी महाराज शिव दयाल सिंह सेठ की स्मारक बना है। स्वामी जी राधा स्वामी मत के संस्थापक थे। उनके अनुयायियों के लिए यह एक पवित्र स्थल है। इसका निर्माण कार्य 1908 ई. में प्रारम्भ किया गया था। यहां श्वते संगमरमर का उपयोग किया गया है तथा नक्काशी व बेलबूटों में रंगीन पत्थरों का प्रयोग किया गया है। यहां के नक्काशीदार बेलबूटें शायद ही भारत में कहीं ओर देखने को मिलें।

सिकंदरा

 

        सिकन्दरा लाल किले से करीब 13 कि.मी. दूरी पर स्थित सिकन्दरा में सम्राट अकबर का मकबरा और इसका शिल्प सौन्दर्य दर्शनीय है। अकबर ने स्वयं ही अपने मकबरे की रूपरेखा तैयार करवा कर इस स्थान का चयन किया था। अपने जीवन काल में मकबरे का निर्माण कराना एक तुर्की प्रथा थी जिसका मुगल शासकों ने धर्म की तरह पालन किया। अकबर के पुत्र जहांगीर ने इस मकबरे का निर्माण कार्य 1613 ई. में सम्पन्न कराया। सुन्दर वृत्ताकार में लाल बलुआ पत्थर से निर्मित विशाल मकबरे के आस-पास हरे-भरे उद्यान बनाये गये हैं। सैलानियों के लिए पांच मंजिला अकबर का मकबरा एक खूबसूरत ऐतिहासिक स्मारक के रूप में दर्शनीय है। मुख्य इमारत के चारों ओर आकर्षक उद्यान बने हैं।

       आगरा एवं सिकन्दरा के मध्य अकबर की ईसाई बेगम मरियम का मकबरा भी दर्शनीय है।फतेहपुर सीकरीआगरा से करीब 35 कि.मी. पर स्थित फतेहपुर सीकरी को सम्राट अकबर ने अपनी राजधानी बनाया था। उसने यहां अनेक सुन्दर इमारतें व मस्जिद बनवाई।

फतेहपुर सीकरी

       फतेहपुर सीकरी हिन्दु और मुस्लिम वास्तुशिल्प का एक अच्छा नमूना है। फतेहपुर सीकरी को 1569 ई. में अकबर ने बसाया था। उसने शेख चिश्ती के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्ति की खुशी में चिश्ती से प्रभावित होकर यहां किला एवं कृत्रिम झील बनवाई। किले की ऊँची दीवार में नौ दरवाजे बने हैं। अकबर यहां करीब 15 वर्ष रहा और सम्भवतः पानी की कमी के कारण वापस आगरा लौट गया। यहां आने के लिए आगरा से बस, टेक्सी, जीप आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस स्थान को देखने के लिए एक दिन का समय प्रर्याप्त है।बुलन्द दरवाजाबुलन्द दरवाजे को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। बुलन्द दरवाजा 53.63 मीटर ऊँचा और 35 मीटर चौड़ा है। इसे लाल और बलुआ पत्थर से बनाय गया है। इस बुलन्द द्वार की सज्जा और नक्काशी में काले व सफेद संगमरमर पत्थर का उपयोग किया गया है। बुलन्द दरवाजे के मध्य ऊपर की ओर लगे शिलालेख से अकबर की धार्मिक भावना का पता चलता है। बुलन्द दरवाजे की जमीन की ऊँचाई 280 फीट है। दर्शक 52 सीढि़यां चढ़ने के बाद इस दरवाजे पर पहुँचते हैं। दरवाजे में लकड़ी के विशाल किवाड़ आजतक वैसे ही लगे हुए हैं। बुलन्द दरवाजे को सम्राट अकबर ने अपनी गुजरात विजय के बाद 1602 ई. में बनवाया था।बुलन्द दरवाजे के पीछे यहां की मस्जिद मक्का की मस्जिद की तर्ज पर बनाई गई है और इसके डिजाईन में हिन्दू और पारसी वास्तुशिल्प का प्रयोग किया गया है। मस्जिद में एक स्थान पर एक विचित्र प्रकार का पत्थर लगा है। जिसको थपथपाने से नगाड़े जैसी ध्वनी सुनाई देती है। मस्जिद पर सुन्दर नक्काशी की गई है। मस्जिद के उत्तर में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह बनी है। बताया जाता है कि यहां आकर निःसन्तान मुस्लिम महिलाएं सन्तान के लिए दुआ मांगती हैं। शेख सलीम की समाधि संगरमर से बनी है तथा इसके चारों ओर पत्थर के बहुत बारिक कार्य की सुन्दर जाली लगाई गई है जो मनमोहक दिखाई देती है। यह जाली दूर से देखने पर जालीदार श्वेत रेशमी वस्त्र की भांति नजर आती है। समाधि के ऊपर मूल्यवान सीप, सींग तथा चन्दन का 400 वर्ष पुराना शिल्प कार्य लगता है मानो अभी-अभी किया है। श्वेत पत्थरों में विविध रंगों वाली फूल-पत्तीयां नक्काशी की कला के उदाहरण है। समाधि के किवाड़ आबनूस के बने हैं।समाधि के पीछे की ओर लम्बे ऊँचे चबूतरे पर अकबर का महल बना है। इसमें चार चमन और ख्वाबगाह मुख्य राज महल थे। चार चमन के सामाने आंगन में अनूपताल है जहां तानसेन राग दीपक गाया करते थे। ताल के पूर्व में अकबर की तुर्की बेगम रूकैया का महल है। इस महल की सजावट तुर्की के शिल्पकारों ने की थी।रूकैया बेगम के महल के दांई ओर दीवान-ए-आम 350 फीट लम्बा नक्काशीदार हॉल बना है जहां अकबर अपनी दो बेगमों के साथ न्याय करता था। दीवान-ए-खास की विशेषता इसके मध्य एक पùाकार अष्टकोणीय पाषाण स्तम्भ है जिसपर भवन टिका हुआ है। यह एक मंजिला भवन बाहर से देखने पर दुमंजिला नजर आता है। परिसर में पाँच मंजिला इमारत पंच महल स्थित है जो 176 खम्भों पर बना है। प्रत्येक खम्भे की डिजाईन और कारीगरी अलग-अलग है। जोधा बाई का महल, सुल्तान महल एवं नौबत खाना आदि अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल भी यहां पर हैं।