अनूठा है सिद्धों की गुफाओं वाला मगरा जहाँ गरुड़ ने तपस्या की, पाण्डवों ने रमाई धूँणी

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विशेष पर्यटन लेख (राजसमन्द पर्यटन)   – डॉ. दीपक आचार्य –

 बहुआयामी लोक संस्कृति, पुरावैभव और प्राचीन परंपराओं का धनी राजसमन्द देश भर में अपनी तरह का ऎसा अनुपम और मनोहारी क्षेत्र है जहाँ की वादियों में सुकून के सुनहरे और रसीले मनोहारी प्रपात झरते रहे हैं। पर्वतीय सौन्दर्य के साथ ही यहाँ की पर्वत श्रृंखलाओं में बसे प्राचीन महत्व के दर्शनीय स्थलों  का भी अपना विशिष्ट इतिहास रहा है। इन्हीं में एक है गराड़िया मगरा।

        राजसमन्द जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर भाटोली ग्राम पंचायत के सथाना क्षेत्र में अवस्थित यह पहाड़ी पुराने जमाने से लोक श्रद्धा और आस्था का केन्द्र रही है। गराड़िया मगरा अपने भीतर अनेक गुफाओं को सहेजे हुए हैं जिनका एकान्त और प्रकृति का सामीप्य पाकर प्राचीनकाल में सिद्ध तपस्वियों और ऋषि-मुनियों से लेकर संत-महात्माओं ने कठोर तपस्या की और लौकिक एवं अलौकिक सिद्धियों को लोक कल्याण एवं जगत उद्धार में लगाया।

आस्था का पर्वतीय धाम

        इस पहाड़ी के शिखर पर गराड़िया माता का धाम है जहाँ चतुर्मुखी शिवलिंग, हिंगलाज माता, अखण्ड जोत, धूंणी, महाकाली, हनुमान, भैरव आदि की मूर्तियाँ स्थापित हैं। हर मौसम में गराड़िया मगरा का नैसर्गिक वैभव सुकून की फुहारों से नहलाता रहता है।

        सूर्योदय एवं सूर्यास्त के मनोहारी नज़ारे के साथ ही इस पहाड़ी से मीलों तक का विहंगम दृश्यावलोकन किया जा सकता है। वन्य जीव भी यहाँ पूरी मस्ती के साथ विचरण करते हुए देखे जाते हैं। पक्षियों का भी कलरव यहां दिन भर गूंजता रहता है।

        लम्बे समय से गराड़िया माताजी धाम की सेवा-पूजा कर रहे महंत हरिनन्द जी महाराज के अनुसार इस पहाड़ पर गरुड़जी ने तपस्या की और इसी वजह से इस पहाड़ को गरुड़िया मगरा कहा जाने लगा जो बाद में अपभ्रंश होकर गराड़िया मगरा हो गया। बाद में पाण्डवों ने यहाँ धूंँणी स्थापित की। इसे योगेश्वर की गादी भी कहा जाता है।

        इस धूँणी के बारे में मान्यता है कि यह सिद्ध है व इसमें श्रीफल हवन करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हरिनंद महाराज को अध्यात्म की शिक्षा-दीक्षा अपने गुरु भैरूराम जी महाराज से मिली, जिन्होंने वर्षों तक तपस्या के बाद जीवित समाधि ले ली थी।

       सिद्धों की गुफाएँ

        गराड़िया मगरा के आँचल में कई गुफाएं हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि प्राचीनकाल में सिद्धों ने तपस्या और ध्यान के लिए इन गु्फाओं का उपयोग किया। पहाड़ी के शिखर पर अवस्थित गराड़िया माताजी मन्दिर के पाश्र्व मेें स्थित गुफा में हिंगलाज देवी प्रतिमा है जहां अखण्ड जोत प्रज्वलित है। इस तरह की तीन गुफाएं हैं लेकिन अब इन्हें बंद कर रखा गया है।

        यहाँ रहे महन्त शीतलनाथ महाराज के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत सिद्ध थे और उनकी आराधना के वक्त शेर भी उपस्थित रहता था। पहाड़ की निचाई में अवस्थित गुफा में हनुमान, काली, कालाजी-गोराजी भैरव आदि की प्रतिमाओं के साथ धूंणी है।

        भाटोली पंचमुखी हनुमान मन्दिर आश्रम के महंत श्री जगदीश भाई सेन गराड़िया मगरा को सिद्धों का डेरा बताते हुए कहते हैं कि गराड़िया मगरा से कभी-कभार गर्जना भी सुनाई देती है। इस धाम पर नाथ योगियों का भी दबदबा रहा है। वे बताते हैं कि नाथजी महाराज की कृपा से फतहपुरा व आस-पास के कई परिवारों के वंशज अपने नाम के साथ सिंह की बजाय नाथ लगाते हैं। इस धाम के बारे में मान्यता है कि यहां वही संत या साधक टिक सकता है जो कि सच्चा हो।

ग्रामीणों की आस्था का केन्द्र

        क्षेत्र भर के विभिन्न गांवों के लोगों के लिए गराड़िया मगरा श्रद्धा केन्द्र होने के साथ ही प्राकृतिक भ्रमण स्थल और पिकनिक स्पॉट भी है। गराड़िया मगरा की धूंणी को बारह गांव की धूंणी कहा जाता है जिसके प्रति भाटोली, सथाना, नमाना, पाखण्ड, राज्यावास, पिपली आचार्यान, मेंघटिया कला, मेंघटिया खुर्द, बिजनोल आदि गांवों के ग्रामीणों की अगाध श्रद्धा है। शिवरात्रि में यहां श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है।

गराड़िया मगरा किसी हिल स्टेशन से कम नहीं है जहाँ हर मौसम का आनंद पाया जा सकता है। गराड़िया मगरा के प्रति श्रद्धावान भक्तों के लिए विश्राम स्थल भी यहाँ मौजूद है। मीलों दूर से दिखाई देने वाला गराड़िया मगरा का पुरातन वैभव आज भी आकर्षण और श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है।