सर्दियों में घूमना है तो चले आये मरुधरा के स्वर्णिम त्रिकोण की यात्रा पर

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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल (लेखक एवम पत्रकार,कोटा)
         राजस्थान की मरुधरा पर रेत के टीबों पर रेत का इंद्रधनुष, सूर्योदय एवम सूर्यास्त का आलोकिक दृश्य, केमल सफारी, लोक कलाकारों का जादुई नृत्य-संगीत, स्वर्णिम आभा लिए महल, शौर्य के प्रतीक किलें, भक्ति भाव की सरिता बहाते देव धाम, स्थापत्य कला की अनूठी मिसाल भव्य हवेलियां, प्राकतिक सौन्दर्य एवम कलात्मक छतरियों का संगम लिए उद्यान ..यह सब आस-पास देखना हो तो इस सर्दियों में चले आये रेगिस्तान में पर्यटन के स्वर्णिम त्रिकोण जोधपुर, जेसलमेर एवम बीकानेर की यात्रा पर। हमारा वायदा है आपकी यह यात्रा अविस्मरणीय रहेगी। सर्दियों में घूमने का यहां वर्ष का सबसे अच्छा मौसम है।
       आपकी कल्पना से परे होगा रेगिस्तानी सपनों का यह सतरंगी संसार। रेगिस्तान के बारे में बनी आपकी कल्पना बदल जाएगी। आप सोच नहीं सकते जिसे हम रेगिस्तान कहते हैं केवल ऊँटो और रेत की कल्पना ही नहीं वरण वह इतना सुंदर, आकर्षक, बहुरंगी, कल्पनातीत, संगीतमय, प्राकृतिक , अनूठा और अलबेला होगा।
जोधपुर
     जोधपुर सूर्य नगरी एवं मरूस्थल का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला जोधपुर राजस्थान का महत्वपूर्ण पर्यटक नगर है। इसकी स्थापना राव जोधा ने 1459 ई. में की थी। 15 वीं शताब्दी का विशालकाय मेहरानगढ़ किला मैदान से 125 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। आठ द्वारों व अनेक बुर्जो से युक्त यह शहर 10 कि.मी. लम्बी ऊँचे परकोटे से घिरा था जो आज विशाल शहर बन गया है।       मेहरानगढ़ किले को जोधाना एवं मयूरध्वजगढ़ भी कहा जाता है। किले की चोटी पर चामुण्डा देवी का मंदिर स्थित है। किले में फूल महल, मोती महल, श्रृंगार चौकी आदि दर्शनीय हैं। महलों में बने भित्ती चित्र, संग्रह की गई सुन्दर पालकियां एवं एक पगड़ी संग्राहलय विशेष रूप से दर्शनीय हैं। किले की बुर्जो पर विभिन्न प्रकार की तोपे रखी गई हैं।
       किले से पूर्व चढ़ाई पर स्थित है महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में 1899 में निर्मित जसवंत थड़ा की छतरी। मेहरानगढ़ किला एवं जसवंत थड़ा की स्थापत्य कला एवं कारीगरी बेजोड़ है। जसवंत थाड़ा पूरी तरह से सफेद दूधिया पत्थर से बने जसवंत थाड़ा को राजस्थान का ताजमहल कहा जाता है।
      उम्मेद पैलेसजोधपुर का उम्मेद पैलेस एशिया के भव्य महलों में शीर्ष स्थान रखता है। इसका निर्माण अकाल राहत के तहत लोगों को मजदूरी देने के लिए किया गया था। छीतर पत्थर से बना होने के कारण इसे छीतर महल भी कहा जाता है। यहां महलों में संग्रहित वस्तुएं, संस्कृति के पहलु, घड़ी संग्रहालय तथा विभिन्न प्रकार की चित्रकृतियां एवं अन्य वस्तुएं दर्शनीय हैं। यह महल अब भव्य होटल में तब्दील हो गया है। इसे देखने के लिए निर्धारित शुल्क देना होता है। महल को देखना अपने आप में अनूठा अनुभव है। इसका निर्माण सन 1928 से सन 1943 के बीच जोधपुर के राजा उम्मेद सिंह ने करवाया था। उस समय इलाके में भयंकर सूखा पड़ा था। आम लोगों को रोजगार देने के लिए इस महल का निर्माण करवाया गया था। इसके आसपास 26 एकड़ का खूबसूरत बगीचा भी है। इसे बनाने में पूर्वी और पश्चिमी परंपराओं को मिश्रित किया गया है। महल को बनाने में राजपूतों से लेकर पुनर्जागरण काल की वास्तुकला को साथ लाया गया है। आजए इस सुनहरे पत्थरों से बने महल में 64 लग्ज़री कमरे और सुइट के साथ एक संग्रहालय भी है।
        मण्डोर गार्डनजोधपुर का मण्डोर गार्डन यहां के शासकों की प्राचीन राजधानी था। यहां का दुर्ग, देवल, देवताओं की साल, जनाना उद्यान, संग्रहालय, एक थम्बा महल, अजीज पैलेस, तानापीर की दरगाह, मकबरे, जैन मंदिर तथा वैष्णव मंदिर दर्शनीय हैं। नागादड़ी, सरोवर, बांध तथा पंचकुण्ड अन्य दर्शनीय स्थल हैं। मण्डोर में 33 करोड़ देवी-देवताओं की गद्दी प्रसिद्ध है। जोधपुर में एक चिडि़याघर भी बना है। जोधपुर में कई मंदिर दर्शनीय हैं।
        जोधपुर से 65 कि.मी. दूरी पर फलौदी मार्ग पर स्थित ओसियां मंदिरों की दृष्टि से प्रमुख पर्यटक स्थल है। यहां सूर्य मंदिर एवं सच्चियामाता के मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं। यहां पर सातवीं से सोलहवीं सदी के मध्य बने 16 मंदिर स्थित हैं। इनमें जैन एवं ब्राह्मण्ड मंदिर भी शामिल है।
     जोधुपर से 45 कि.मी. दूरी पर काले हिरनों के लिए प्रसिद्ध धावा वन्य प्राणी उद्यान तथा 135 कि.मी. पर प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए प्रमुख स्थल खींचन स्थित है। बिलाड़ा की आई माता मंदिर भी दर्शनीय है।
जैसलमेर
     जैसलमेर में रेगिस्तान का अविभूत करने वाला सोनार किला लगता है जैसे प्रत्यक्ष रूप से एरेबियन नाइट्स की कथाओं से निकलकर आया है। किले के अन्दर मध्ययुगीन जीवन एवं ऐश्वर्य का जादू दिखाई देता है जो भव्य महलों, हवेलियों, मंदिरों में अनाम शिल्पियों की कारीगरी का जीवन्त उदाहरण है। शाम को जब सूरज अस्त होने को होता है तो आकर्षक सुनहरी मटमेले रंग की किरणों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। सूर्योदय की बेला में सम्पूर्ण जैसलमेर एक फूल की तरफ खिल उठता है।
राजस्थान का दूरस्थ रेगिस्तानी क्षेत्र जैसलमेर पाकिस्तान की सीमा से जुड़ा है। जैसलमेर को स्वर्ण नगरी, पीले पत्थरों का शहर, हवेलियों और झरोखों की नगरी, रेगिस्तान का गुलाब, राजस्थान का अण्डमान तथा स्वर्णिम इतिहास का साक्षी की संज्ञाओं से विभूषित एवं अलंकृत किया जाता है।
       मरू उत्सव प्रति वर्ष फरवरी  माह में आयोजित होने वाले मरू उत्सव के दौरान शहर में बिखरे इन्द्रधनुषी रंगों में जब जैसलमेर नहाता है तो आने वाले सैलानियों की खास पसन्द बन जाता है। लोक वाद्ययों की ताल पर गायकों की सुरीले स्वर एवं लोक कलाकारों के लुभावने नृत्य वातावरण को रेगिस्तानी अंचल की लोक संस्कृति का प्रतीक बना देते हैं और गीतों और नृत्यों पर विदेशी भी थिरकने को मजबूर हो जाते हैं। लोक नृत्य के साथ-साथ विविध प्रतियोगिताएं विशेषकर पगड़ी बांधने, मरू श्री एवं ऊँटों की दौड़ इस उत्सव को जीवन्त रूप प्रदान करती हैं। इस मौके पर आयोजित होने वाले हस्तशिल्प के रंग-बिरंगे बाजार देखते ही बनते हैं।                पूर्णमासी की रात में सम के रेतीले धोरों की पृष्ठभूमि में लोक कलाकारों का संगम देखते ही बनता है। इतिहास साक्षी है कि छठी शताब्दी में मथुरा से बहिर्गमन कर यादव वंशी पूर्वज जो अपने आप को भगवान कृष्ण का वंशज बताते थे, जैसलमेर के भू-भाग पर आकर बस गये। इन्होंने सर्वप्रथम तनोट को एवं बाद में लौद्रवा को अपनी राजधानी बनाया।
       राजा जैसल भाटी अपने समय में लौद्रवा से राजधानी को लेकर त्रिकूट आये और जैसलमेर के त्रिकूट पर्वत पर 1156 ई. में किला बनाकर अपनी राजधानी स्थापित की। सोनार किला त्रिकूट पर्वत पर बना सोनार किला जमीन से 250 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। पीले पत्थरों से बने इस किले का महत्व इस बात से है कि इसमें कहीं भी चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। किला 1500 फीट लम्बा एवं 700 फीट चौड़ा है तथा किले में 30-30 फीट ऊँचे 99 बुर्ज बने हैं। दोहरी सुरक्षा व्यवस्था के चलते यह किला हमेशा अभेद्य रहा। किले में प्रवेश के लिए अखेपोल, सूरजपोल, गणेशपोल एवं हवापोल चार दरवाजे बने हैं। हवापोल के बाद एक विशाल प्रांगण आता है जिसके चारों तरफ मकान, महल व मंदिर बनाये गये हैं। यहां बना रंग महल, गजनिवास एवं मोती महल स्थापत्य कला के शानदार नमूने हैं। महलों में भित्ती चित्र तथा लकड़ी पर की गई बारिक नक्काशी का कार्य देखने योग्य है। महलों में पत्थर की सुन्दर जालियां एवं झरोखें सुन्दरता प्रदान करते हैं। महलों के सामने आदिनारायण एवं शक्ति के मंदिर बने हैं। दुर्ग में लक्ष्मीनाथ जी का एक मात्र हिन्दू मंदिर सोने व चाँदी के कपाटों के कारण विशेष महत्व रखता है। आस-पास कारीगरी में अनुपम जैन मंदिर 14 वीं एवं 15 वीं शताब्दी की स्थापत्य व मूर्ति कला का सुन्दर नमूने हैं। मंदिरों के तल गृह में जिन भद्र सूरी ज्ञान भण्डार में दुर्लभ एवं प्राचीन पाण्डुलिपियों का संग्रह किया गया है। यहां 1126 ताड़पत्र एवं 2252 कागज पर लिखी पाण्डुलिपियां पाई जाती हैं। सबसे लम्बी पाण्डुलिपी ताडपत्र पर लिखी जो 32 इंच लम्बी है।
        पटवों की हवेलियां खूबसूरत हवेलियों के शहर में एक कतार में बनी पांच पटवों की हवेलियां जो सतखण्डी है का शिल्प एवं मूर्तिकला, झरोखें आदि पत्थर में तराशी गई रचनाएं देखते ही बनती हैं। हवेलियों के भीतर चित्रकारी, हाथी दाँत एवं काँच की कारीगरी का कार्य दर्शनीय है। इन हवेलियों को प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रखा जाता है।
     हवेलियों की कड़ी में ही सालिमसिंह की हवेली जो सोनार किले के पूर्वी ढलान पर स्थित है शहर की सबसे ऊँची हवेली मानी जाती है। इसे दीवान सालिम सिंह ने 1825 ई. में बनवाया था। हवेली की नक्काशी और कंगूरों की बारिक शिल्प कला अत्यन्त लुभावनी है। शहर में बनी नथमल की हवेली भी स्थापत्य कला का एक चमत्कार नजर आती है।
       गड़सीसर सरोवर शहर के मध्य स्थित करीब 840 वर्ष प्राचीन गड़सीसर सरोवर का सौन्दर्य देखते ही बनता है। इसमें सैलानियों के लिए नौकायन की व्यवस्था की गई है। इसके किनारे पर स्थित संग्रहालय में स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। जैसलमेर के शासकों की कलात्मक छतरियों के लिए बना बड़ा बाग दर्शनीय स्थल है। शहर में बना पाँच मंजिला बादल विलास महल जो ताजिया टावर जैसा प्रतीत होता है तथा जवाहर विलास पैलेस अपनी छतरियों तथा झरोखों के लिए प्रसिद्ध है। जैसलमेर के समीप ही मरू राष्ट्रीय उद्यान गोडावन पक्षी के कारण तथा आंकल वुड फॉसिल्स पार्क जहां 18 करोड़ वर्ष प्राचीन पेड़-पौधों के जीवाष्म पाये जाते हैं दर्शनीय हैं।सम के धोरेरेगिस्तान में पहुँचकर रेत के धोरें नहीं देखें यह कैसे हो सकता है।
      जैसलमेर से 42 कि.मी. दूर सम एवं 45 कि.मी. दूर खुहड़ी के रेतीले धोरों का आकर्षण सैलानियों के लिए किसी भी प्रकार कम नहीं है। बालू के लहरदार धोरों पर जब संध्याकाल में सूर्य की किरणें अपनी आभा फैलाती हैं तो इनका रंग सुनहरा हो जाता है जो देखने वालों के दिल को छू लेता है। बालू के टीलों पर ऊँट की सवारी करना तथा स्थानीय कलाकारों के लोक संगीत का आनन्द लेने का अपना अलग ही मजा हैं। रात्रि में इन धोरों के समीप स्थित खुले मंच पर लोक कलाकारों के गीत-संगीत, नृत्य आदि का आनन्द भी सैलानी उठाते हैं। इन धोरों एवं इनका आनन्द लेने का मजा वही जान सकता है जिसने नजदीक से इन्हें देखा है और महसूस किया है।
     जेसलमेर आने वाले पर्यटकों के लिए 120 कि.मी. दूरी पर तनोट में राजस्थान एवं पाकिस्तान की सीमा तथा यहां बना तनोट राय माता का मंदिर, 16 कि.मी. दूरी पर जैसलमेर की प्राचीन राजधानी और प्रसिद्ध जैन तीर्थ लोद्रवा, 125 कि.मी. पर रूणेचा में लोक देवता रामदेव जी का तीर्थ स्थल तथा 110 कि.मी. पोकरण में स्थित लाल पाषाण से निर्मित सुन्दर दुर्ग एवं हवेलियां दर्शनीय स्थल हैं। मरू उत्सव एवं रामदेवजी का मेला जिले के सर्वाधिक महत्वपूर्ण मेले हैं। कुलधारा नामक स्थान कैक्टस गार्डन के लिए प्रसिद्ध है।
बीकानेर
       मरूस्थल की गोद में बसा बीकानेर अपने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ भौगोलिक विशिष्टता के लिए विख्यात है। लाल पत्थर के भव्य महल एवं हवेलियां बीकानेर को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करती हैं। इस शहर की स्थापना 1459 ई. में राव बीकाजी द्वारा की गई थी। पाँच द्वारों के साथ 7 कि.मी. लम्बी पंक्तिबद्ध दीवार से घिरा हुआ है। लहरदार गलियां, रंगीन बाजार एवं हँसते-मुसकुराते लोग बीकानेर का एक नया अनुभव देते हैं। यहां के रसगुल्ले, भुजियां एवं पापड़ पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। बीकानेर उस्तांकला के लिए पहचाना जाता है। इसमें ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी और मुनव्वत का कार्य किया जाता है। यहां संग्रहालय एवं राज्य अभिलेखागार विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
जूनागढ़ किला
        शहर में स्थित जूनागढ़ किले का निर्माण राजा राय सिंह ने करवाया था। यहां का शस्त्रागार और 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर दर्शनीय हैं। यह किला चारों ओर से खाई से घिरा हुआ है। किले में अनूप महल, कर्ण महल, रंग महल एवं फूल महल प्रसिद्ध हैं। बीकानेर में ही स्थित लालगढ़ पैलेस बलवा पत्थर से बना शिल्प का बेजोड़ नमूना है। इसे महाराजा गंगा सिंह द्वारा अपने पिता महाराजा लाल सिंह की स्मृति में बनवाया गया था। महल के एक हिस्से को हैरिटेज होटल में तब्दील कर दिया गया है तथा यहां सार्दुल संग्रहालय भी स्थित है।                बीकानेर स्थित भाड़ासर जैन मंदिर भी अपनी कला के कारण दर्शनीय है। प्रतिवर्ष बीकानेर में जनवरी माह में दो दिवसीय ऊँट उत्सव के आयोजन में बड़ी संख्या में देशी एवं विदेशी सैलानी भाग लेते हैं। ऊँट उत्सव बीकानेर पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
      करणीमाता मंदिरबीकानेर से 30 कि.मी. दूरी पर देशनोक में स्थित करणी माता का स्थापत्य कला में अद्वितीय मंदिर चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। यहां सफेद चूहें का दिखना शुभ माना जाता है, जिन्हें काबा भी कहा जाता है। इस मंदिर की ख्याति पूरे विश्व में हैं। बीकानेर से 30 कि.मी दूरी पर ही स्थित गजनेर महल एवं वन्य जीव अभ्यारणय दर्शनीय है। यहां बनी झील आकर्षक है जिसमें शीतकाल में प्रवासी पक्षी बसेरा करते हैं। यह काले तीतर के लिए भी विख्यात है। यहां पर बना गोपाल मंदिर भी दर्शनीय है। बीकानेर से 50 कि.मी. दूरी पर स्थित कोलायत को सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनी की तपो भूमि कहा जाता है। कोलायत झील के किनारे स्थित कपिल मुनी का मंदिर दर्शनीय है। बीकानेर से 45 कि.मी. दूरी पर जिले का प्रमुख पर्यटन स्थल कातरियासर स्थित है। रेत के विशाल धोरे, ग्रामीण पर्यटन एवं ऊँट उत्सव के लिए यह प्रसिद्ध है। इस स्थल को जसनाथी सम्प्रदाय के लोगों के ”अग्नि नृत्य“ के लिए पहचाना जाता है। इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक जसनाथी जी का जन्म यहीं पर हुआ था और इनका यहां प्रतिवर्ष मेला लगता है। बीकानेर से 24 कि.मी. दूर स्थित कोडम देसर में एक जलाशय के किनारे भैरूजी का मंदिर स्थित है। राव बीकाजी ने यहां अपनी राजधानी स्थापित करने से पूर्व 3 वर्ष तक प्रवास किया था। यहां तालाब के किनारे अनेक प्रवासी पक्षी नज़र आते हैं।
          रेगिस्तान की यह स्वर्णिम त्रिकोण की यात्रा आप को वषों तक याद रहेगी। कुछभी भूल नहीं पाएंगे।