सहारे की आस में भटकता बेसहारा गौवंश

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गायों की दयनीय स्थिति पर गीतांजलि पोस्ट के विनय शर्मा, श्रैयांश बैद और कृष्ण कुमार वर्मा की संयुक्त रिपोर्ट…

वेदों-पुराणों में दिया गया हैं मॉ का दर्जा-भारत देश में जहां प्राचीन काल से ही गाय को माँ का दर्जा दिया गया हैं। वहीं वेद और पुराणों के अनुसार भी गाय एक माँ की तरह हमें उम्र भर दूध पिलाकर हमारा भरण पोषण करती हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में मॉ के तीन स्वरूप बतलाए गए हैं। पहली मां जिसने जन्म दिया, दूसरी धरती मां जिसने सृष्टि को अपनाया और तीसरी गऊ मां, जो सारी उम्र मानव को बच्चों की तरह दूध पिलाने के साथ-साथ एक रोग नाशिनी औषद्यालय के रूप में काम करती है। गाय ही एकमात्र ऐसा जीव है, जिसे मां का दर्जा प्राप्त है।

गायों की दयनीय स्थिति– वर्तमान समय में गायों की स्थिति बडी दयनीय है। आज गाय को सिर्फ दूध निकालने के बाद उन्हें सडक पर आवारा पशुओं की तरह छोड दिया जाता हैं। आवारा पशुओं की तरह की आज कुछ लोग गायों को डंडो से भी मारते नजर आ जाते हैं। जहाँ देखो गाये कचरे में मुँह मारती, वार्डो सहित बाजारों में धमा-चौकडी मचाते, बीच सडकों पर झुण्ड बनाकर बैठे, कई बार वाहन चालकों के अचानक सामने आते देखा होगा। आज के हालात में सबसे बड़ा कटु सत्य है कि वेद पुराणों से प्रेरित होकर गायों को पूजा करने वाला मानव ही आज गाय की दयनीय हालत का मुख्य जिम्मेवार बनता जा रहा है।

बेसहारा गौवंश के लिये गौशालाऐं फिर भी सहारे की आस में भटकता गौवंश-

राजस्थान सहित पूरे देश भर में कहने को तो सरकार द्वारा हजारों की तादाद में आवारा गौ वंश के लिए पंजीकृत गौ शालायें है पर उनके होने के बाद भी क्या सहारे की आस में भटकता आवारा गौ वंश नजर नहीं आता जिधर नजर उठा कर देखेंगे वहीं कहीं मुंह मारता या कहीं मुहं मारने के चक्कर मे पिटता नजर आता है। कहने को गौ शालाओं में बडे बडे कार्यक्रम गायों के नाम पर होते है जो कि मात्र स्वयं को महिमा मंडित करने या कुछ धन्ना सेठों के जिनकी अमुक को तुच्छ सहायता पर दिखावा करने व उनको भी गोसेवक के स्वरूप को प्रदशित करने का नाम मात्र का पर्दशन भर ही होता है। एक और पर्दशन और दूसरी और सेवा का भाव आखिर कौन कर रहा है सेवा ?

दम तोडती गायों के लिये जिम्मेदार कौन– वर्तमान समय में आवारा पशुओं की तरह घूमते गौवंश का जिम्मेदार किसे माने गौ पालक जिसने गाय को दूध देने के समय तो घर में रखा लेकिन जैसे ही गाय ने दूध देना बन्द किया उसे रोड पर छोड दिया तो कुछ गायों को पालने वाले सिर्फ गाय का दूध निकालकर उन्हें सडक पर भूखी-प्यासी छोड देते हैं। जिसकी वजह से आज सडक पर पडे कचरों पर गायें अपना मुंह मारती रहती हैं। गौशाला चलाने वालों को इसका जिम्मेदार माने जो गायों की सेवा करने के नाम पर सरकार से सहायता ले रहे हैं।


क्या कहते हैं समाज सेवक- गो सेवक गजानन्द बधाला ने बताया कि गायों की स्थ्ति बडी दयनीय है गाये अपनी इस हालत पर आंसू बहा रही है। उन्होंने बताया कि महंगे जमाने में ग्वाले गायों का सुबह-शाम दुध निकाल कर छोड देते हैं जिससे गाये आवारा पशुओं की तरह इधर-उधर मुँह-मारती रहती है। पशुपालक बताते हैं कि अधिकांश गाये कम दूध देती हैं क्योंकि यहाँ का देसी गौवंश अच्छे बछडे देने मे सक्षम है जो खेती के लिए उपयुक्त होते हैं पर खेती तो आज ट्रैक्टर से होती है और गाय के अमृत तुल्य दूध के कीमत मात्र 40 रुपए लिटर किसानों को मिलती है। ऐसे में जैसे ही वे दूध देना बंद करती हैं उसके मालिक को उसकी खानगी में आने वाला खर्च भी ज्यादा लगने लगता हैं और वे उसे खुल्ला छोड देते हैं।

कचरा खाने को मजबूर हुई गाय- उस समय गायों को वास्तविक रूप में माँ के समान ही माना जाता था परंतु आज की स्थिति कुछ अलग हैं। आज गाय को दूध निकालने के बाद उन्हें भूखी-प्यासी सडक पर आवारा पशुओं की तरह छोड देते हैं और वह सडक पर पडे कचरों पर गायें अपना मुंह मारती रहती हैं।

आज का बडा सवाल यह है कि आखिर गौवंश जाए तो कहां जाएं उन्हें अपना पेट भरने के लिए न तो खाना मिलाता है और स्थान न मिलने के कारण सडकों पर विचरण करने से आये दिन हो रही दुर्घटनाओं से वे लगातर मर रहे हैं । अगर यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने बच्चों को डायनासोर जैसे चित्र में गाय आदि को दिखाएंगे। यह बडा ही चिंतनीय विषय है पर न प्रशासन और न जनता कोई भी इस विषय पर कोई ठोस कार्य नहीं कर रहे। धिक्कार है हमारी मरी हुयी भावनाओं पर, हमारी संकीर्णता पर जो भौतिकता की चका चौंध मे इतनी व्यस्त है कि गौवंश की समाप्ति मे सहयोगी की भूमिका निभा रही है। इस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं है। यह अभिशाप बनकर हम सबके जीवन मे आने वाला है। अगर आगामी पीढी को सुरक्षित रखना है तो आगे बढकर अपनी स्वार्थपरता को त्यागते हुये गौवंश रक्षा हेतु सहयोग करें अन्यथा अपनी बर्बरता का बर्बर परिणाम हमें ही भोगना पडेगा।