मैं ज़िन्दा हूँ मैं ज़िन्दा हूँ

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झूँठौ की महिमा भारी ,
देखे है दुनिया सारी
जनता पिसती बेचारी
कोई कुछ बोले ना!!
झूठे हो जाते सारे
लगते वादे जो प्यारे
डरते सारे के सारे
कोई कुछ बोले ना !!!
चमक दमक के आगे
फिरते हैं पीछे सारे
मन मार के सब बेचारे
कोई कुछ बोले ना !!
मैं बोल रहा हूँ मन से
क्यौ डरते हो तुम उनसे
खा जायेगा क्या कोई
कुछ तो बोलो ना !!
जो बोले सके ना अब भी
कैसे बोलोगे तब भी
जब पूछेगी अगली पीढी
क्या तुम ज़िन्दा थे !!
डर को तो यारो छोड़ो
ज़ुबान के ताले तोडो़
फिर जो़र जो़र से बोलो
मैं ज़िन्दा हूँ मैं ज़िन्दा हूँ ।
✍© *शैलेन्द्र अवस्थी ‘शिल्पी’*