सर्वाधिक सात्त्विक है हिन्दू नववर्ष

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गीतांजलि पोस्ट… चन्द्रपाल प्रजापति, नोएडा

वैसे तो दुनिया भर में नया साल 1 जनवरी को ही मनाया जाता है लेकिन भारतीय कैलेंडर के अनुसार नया साल चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से होता है। इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अक्सर मार्च-अप्रैल के महीने से आरंभ होता है। दरअसल भारतीय कैलेंडर की गणना सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है। माना जाता है कि दुनिया के तमाम कैलेंडर किसी न किसी रूप में भारतीय कैलेंडर का ही अनुसरण करते हैं। मान्यता तो यह भी है कि विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारतीयों द्वारा ही कैलेंडर यानि कि पंचाग का विकास हुआ। 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में सात दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है। कहा जाता है कि भारत से नकल कर युनानियों ने इसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया। अपने देश में कई प्रकार की कालगणना की जाती है जैसे- युगाब्द  (कलियुग का प्रारम्भ), श्री कृष्णच संवत्, शक संवत् आदि हैं।

हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन हिन्दू नव वर्ष मनाया जाता है। हमारे मनीषियों ने यह अद्भुत विधान बनाया है कि हम अपने नव वर्ष का स्वागत शक्ति की देवी दुर्गा जी का पूजा-पाठ करके करते हैं। सनातनधर्मी पूरे नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा करते हैं और नव वर्ष के लिए मंगल कामना करते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रजापति तरंगें सबसे अधिक मात्रा में पृथ्वीपर आती हैं । इस दिन सत्त्व गुण अत्यधिक मात्रा में पृथ्वी पर आता है । अतः यह दिन वर्ष के अन्य दिनोंकी तुलना में सर्वाधिक सात्त्विक होता है । भारत के कई हिस्सों में गुडी पड़वा या उगादी पर्व मनाया जाता है। सतयुग का प्रथम दिन भी इसी दिन शुरू हुआ था। भारतीय नववर्ष का पहला दिन यानी सृष्टि का आरम्भ दिवस, युगाब्द और विक्रम संवत् जैसे प्राचीन संवत का प्रथम दिन, भगवान श्रीराम एवं युधिष्ठिर का राज्याभिषेक दिवस, मां दुर्गा की साधना चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस, आर्य समाज का स्थापना दिवस, सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल जी जयंती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक प्रखर देशभक्त डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार जी का जन्मदिवस, स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया, विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना, कश्मीर में हिंदू नव वर्ष ‘नवरेह’ के नाम से जाना ।
भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व हैं। इस दिन घरों को हरे पत्तों से सजाया जाता है और हरियाली चारो और दृष्टीगोचर होती है। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है। नव संवत्सर का आरंभ न केवल सम शीतोष्ण एवं नवोन्मेषशील ऋतु में होता है, अपितु संसार में प्रचलित संवत्सरों के अन्य दोषों से भी यह वैज्ञानिक दृष्टि से संशुद्धिकृत है। पहली जनवरी से शुरू होने वाला नववर्ष तो सूर्य के सापेक्ष हर साल उसी समय शुरू होता है, लेकिन इसमें चंद्रमा की उपेक्षा की गई है। चंद्रमा से भी पृथ्वी पर कई प्रभाव पड़ते हैं। पूर्णिमा और अमावस्या से समुद्र के ज्वार-भाटे का संबंध तो है ही, मानव की मानसिक अवस्था पर भी उनका प्रभाव देखा जाता है।

यह गणना ज्योतिष विज्ञान के द्वारा निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पत्ति का समय एक अरब वर्ष से अधिक बता रहे है। किसानो के लिए यह नव वर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन माना जाता है। हिन्दु शास्त्रानुसार इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारम्भ गणितीय और खगोलशास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। हिन्दी महीनो के नाम इस प्रकार हैं→चैत्र- मार्च-अप्रैल, वैशाख- अप्रैल-मई, ज्येष्ठ- मई-जून, आषाढ- जून-जुलाई, श्रावण- जुलाई – अगस्त, भाद्रपद- अगस्त –सितम्बर, अश्विन्- सितम्बर-अक्टूबर, कार्तिक- अक्टूबर-नवम्बर, मार्गशीर्ष- नवम्बर-दिसम्बर, पौष- दिसम्बर –जनवरी, माघ- जनवरी –फ़रवरी, फाल्गुन- फ़रवरी-मार्च ।

सौर मंडल के ग्रहों और नक्षत्रों की चाल, निरंतर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने और साल आधारित हैं। इस वैज्ञानिक आधार के कारण ही हिन्दू पंचांग को सबसे सटीक माना जाता है हमारे पूर्वजों ने इतने वैज्ञानिक एवं कालजयी ज्ञान-विज्ञान को लंबे अनुसंधान एवं प्राप्त परिणामों के आधार पर विकसित किया था। लेकिन नई पीढ़ी को अपनी इस श्रेष्ठ परंपरा का ज्ञान ही नहीं है। एक ओर जहां हम अंग्रेजी नव वर्ष को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर हम अपने ही देश के नव वर्ष से परिचित नहीं हैं। नई पीढ़ी यह नहीं जानती कि हमारा नव वर्ष कब आ रहा है और कब जा रहा है। आज आवश्यकता है कि हर भारतवासी अपनी धरोहर से जुड़े और भारतीय संस्कृति के महत्व को जाने। यदि हम नई पीढ़ी तक अपने नव वर्ष की वैज्ञानिकता और महत्ता को पहुंचा सकें, तो मानो यह जीवन सफल हो गया।


चन्द्रपाल प्रजापति, नोएडा