भीलवाड़ा में चप्पे चप्पे पर बिखरा हैं पुरातत्व एवं मंदिरों का वैभव

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गीतांजलि पोस्ट…डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

      भीलवाड़ा नगर 25उत्तरी  अक्षांश तथा 74.39’ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। पश्चिम रेल्वे की अजमेर-खण्डवा रेल लाइन भीलवाड़ा से होकर गुजरती है। अजमेर तथा उदयपुर आदि से यह सड़क मार्ग से भी भली भांति जुड़ा हुआ है। ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में एक भील ने शिव मंदिर का निर्माण करवाया जो अब भीलवाड़ा नगर के जूनाबास में स्थित है। यह मंदिर जातौन का मंदिर कहलाता है। इसी मंदिर के आसपास भीलों की बस्ती बसनी आरम्भ हुई जो आगे चल कर भीलवाड़ा नगर में बदल गई। यह क्षेत्र मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत आता था। जब भी दिल्ली के मुस्लिम शासक मेवाड़ पर आक्रमण करते तब इस क्षेत्र की शांति भंग हो जाती। गांव के गांव खाली हो जाते। मुस्लिम सेनायें इन गांवों तथा कस्बों को जला देतीं और तोड़-फोड़कर धूल में मिला देतीं। जब 1615 ई.  में राणा अमरसिंह ने जहांगीर से सन्धि कर ली तब कुछ समय के लिये भीलवाड़ा में शांति स्थापित हुई। राणा ने पंच महाजनों की सहायता से भीलवाड़ा नगर की स्थानीय व्यवस्था की तथा बाजार का विकास किया। इस नगर से प्राप्त सारी चुंगी बनेड़ा के जागीरदार को प्राप्त होती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जिन दिनों पिण्डारी अपने चरम पर थे, भीलवाड़ा नगर दस से बारह बार लूटा गया। मराठों ने भी खूब लूटमार मचाई।  1806 ई.  में भीलवाड़ा नगर में 6000 परिवार रहते थे किन्तु 1818 ई.  में यहां रहने वाले परिवारों की संख्या शून्य हो गई और पूरा नगर भुतहा शहर में बदल गया। मेवाड़ नरेश भीमसिंह तथा कर्नल जेम्स टॉड ने इस शहर को फिर से बसाने के प्रयास किये। उन्होंने महाजनों को यहां आकर बसने का निमन्त्रण दिया तथा उनकी सुरक्षा का व्यापक प्रबन्ध किया। 1819 ई.  में इस नगर में 1200 परिवार बस गये जिनकी संख्या 1822 में बढ़कर 2700 हो गई।
     भीलवाड़ा के बाजार से व्यापारिक कर के रूप में  1822 ई.  में 2 लाख 17 हजार रूपया प्राप्त हुआ। वर्ष 1825 ई.  में बिशप हैबर ने भीलवाड़ा की यात्रा की तथा यहां के बाजार एवं समृद्धि कर वर्णन किया। भीलवाड़ा का बड़ा मंदिर अत्यन्त पुराना है। इस मंदिर में विष्णु-लक्ष्मी की प्रतिमायें दर्शनीय हैं। प्राचीन तालाब धर्म तलाई (धांधालाई) के किनारे सेन्ट्रल पार्क पिकनिक का अच्छा स्थान है। गान्धी नगर मौहल्ले में स्थित मंदिर भी दर्शनीय है। भीलवाड़ा के वार्ड सं. 7 में पंचमुखी हनुमानजी का 300 वर्ष पुराना मंदिर, 500 वर्ष पुरानी मसाना वाली बावड़ी, 250 वर्ष पुराना बद्री नारायण मंदिर, धानमण्डी में स्थित राम स्नेही संप्रदाय की राम मेडिया, इसी वार्ड में, शीतला माता मंदिर, तेजाजी का थान, बाबा मंदिर, पटवारियों का मंदिर, सिंधी माता का मंदिर, आसजी का बाग, 200 वर्ष पुराना तालाब, रामदेव मंदिर, देवनारायण मंदिर, 300 वर्ष पुराना दुर्ग, गान्धी सागर, कुशलचन्द्र सूरी की दादा बाड़ी, उदय सौभाग्य जी का उपासरा, खटीक मौहल्ले में अमरतिया भैंरूजी दर्शनीय हैं। वार्ड सं. 14 में सीतारामजी की बावड़ी दर्शनीय है जहां एक गुफा भी बनी हुई है। इस गुफा में बैठकर राम स्नेही सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी रामचरण जी ने 36 हजार पदों की रचना की तथा राम स्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की। वार्ड सं. 24 में 100 वर्ष पुराना सरकारी दरवाजा तथा कमाल का कुआं दर्शनीय है। सीतारामजी, गजाधर जी तथा मानसिंह जी के घर की दीवारों में बने हुए भित्ति चित्र दर्शनीय हैं। वार्ड सं. 35 में मेवाड़ के दीवान रहे बोलियों के महल, अलखजी का देवरा व बावड़ी जिसमें प्राचीन मूर्तियां लगी हैं, देव डूंगरी, गुफा, रामदेव मंदिर, यति का जैन उपासरा, नेवटियों का जैन मंदिर, जाटों के मंदिर की गली में रखी प्राचीन खण्डित मूर्तियां तथा शीतला माता मंदिर दर्शनीय है। वार्ड सं. 36 में लक्ष्मीनारायणजी का 250 वर्ष पुराना मंदिर, कलात्मक मूर्तियों युक्त बड़ा मंदिर, चामुण्डा माता का मंदिर, राजा शालिवाहन के 1000 वर्ष पुराने महल, राजबाड़ा बारादरी, धूलाकोट माताजी का मंदिर, हरड़या महादेव, गणगौर घाट, तालाब पर शिलालेख, बड़ा तालाब, रूठी रानी का महल, गणगौर घाट का महल, राम बाव, सांड बाव, बाड्या डूंगर आधार शिला, मंगरी वाले हनुमानजी, सती के चबूतरे, नवलजी का मंदिर, मुछयालाई तलाई, नरसिंह द्वारा, लाड्या डूंगर की धूणी, स्वरूपसिंह जी के महल, चौथ माता व दरवाजा, जैन उपाश्रय के बाहर चौपड़ पर का शिलालेख, काजी की हवेली, बालक नाथ का महल, कोठारियों के नोहरे के पास देवनारायण मंदिर, कोली मौहल्ले का बड़, खारोलों का मंदिर,  मालियों का मंदिर, बोलियों की बावड़ी, तालाब की छतरियां, नीलगरों के माट, अधर शिला महादेव भट्टनाथ की गुफायें, हाथी का ठाण, नेवटियों की बावड़ी, तथा आकाश्यां भैंरू युद्ध स्थल, वार्ड सं. 37 में बावड़ी, पातीजा महादेव, नाथमल तालाब, सूरज पोल, गणेश पोल, बड़ी हथाई, अमरदासजी की बावड़ी, मंडी के हनुमान, भैंरूजी पाताला के रास्ते पर फड़ चित्र कथा बनाने वाले जोशियों का मकान, तालाब की पाल पर स्थित गणेश मंदिर, वार्ड संख्या 38 में खेमराज भैंरू, धर्म तालाब, देवनारायण मंदिर, घाटा राणी माताजी तथा नील की खेती के कुण्ड, दर्शनीय हैं। वार्ड सं. 39 में गोपालजी का मंदिर, खाकी जी की बावड़ी, नीलगरों के माट, कबीर द्वारा, बड़ा मंदिर तथा तट की बावड़ी, वार्ड सं. 40 में बाबाजी की बावड़ी, झाल का देवरा, पाबूजी का मंदिर, रामदेवजी का मंदिर, तथा देव-नारायणजी का मंदिर  दर्शनीय हैं।
रामद्वारा भीलवाड़ा-
         भीलवाड़ा में रामस्नेही संप्रदाय का रामद्वारा स्थित है। स्वामी रामचरण दो वर्ष जयपुर में रहने के पश्चात् भीलवाड़ा पहुँचे। सम्वत् 1817 में उन्होंने भीलवाड़ा आकर मयारामजी की बावड़ी में तपस्या आरम्भ की। इसी स्थान पर सम्वत् 1820 में आपकी वाणी का उद्गम हुआ। उस समय मेवाड़ में सगुण भक्ति व मूर्ति पूजा का जोश था। लोग बाह्म आडम्बरों में उलझे हुए थे। ऐसी अवस्था में स्वामी श्री रामचरण ने वहाँ पहुँच कर निर्गुण भक्ति का प्रचार प्रारम्भ किया। उस समय वे अकेले ही थे-पश्चिम दिशा बावड़ी देखी।  यहाँ रहकर स्वामीजी ने मौनव्रत धारण कर लिया। उनकी साधना की चर्चा नगर में होने लगी, लोग दर्शनार्थ आने लगे। धीरे-धीरे लोग इनसे प्रभावित हुए। सर्वप्रथम केवलराम, नवलराम तथा कुशलराम नामक व्यक्ति इनसे प्रभावित होकर इनकी चर्चा करने लगे। धीरे-धीरे इनके और भी शिष्य बने।भीलवाड़ा में इनका विरोध भी काफी हुआ। इन्हें विष देने का प्रयास हुआ, भील द्वारा हमला करवाया गया, लाठियों से वार किया किन्तु इन्होंने अपने चमत्कार से इन सब आक्रमणों को बेअसर कर दिया। उनके विरोधियों ने उदयपुर के महाराणा अरिसिंह से इनके मत का प्रसार रोकने की प्रार्थना की। रामचरण जी को जब यह ज्ञात हुआ तो वे निराश हुए तथा भीलवाड़ा छोड़कर कुहाड़ा आ गए। भीलवाड़ा में ही श्री रामचरण की वाणी का उद्गम हुआ था इसलिए बाद में श्रद्धालु भक्तजनों ने सरकार से बारह बीघा जमीन खरीदकर संवत् 2022 में विशाल रामद्वारे का निर्माण कराया। तब से यह स्थान रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रमुख श्रद्धा स्थल है। शाहपुरा के अतिरिक्त फूलडोल का उत्सव यहाँ भी मनाया जाता है।
    बारहद्वारी में आचार्य की मुख्य गादी स्थापित है। इस गादी पर बैठकर रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाधीश लोगों को सम्बोधित करते हैं, आचार्य की अनुपस्थिति में मुख्य गादी रिक्त रहती है परन्तु उसके आस-पास एक-दो सन्त अवश्य बैठे रहते हैं। मुख्य गादी को सुनसान नहीं छोड़ा जाता। श्वेत वस्त्र से सज्जित यह गादी सम्प्रदाय में आदर का प्रमुख केन्द्र मानी जाती है। आचार्य के निवास के लिए पीठ स्थान के प्रकोष्ठ में एक पृथक कक्ष की व्यवस्था है जिसमें आचार्य निवास करते हैं। यह स्थान इस ढंग से बनाया गया है कि आचार्य के एकान्तवास में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। रामनिवास धाम में ही स्थित है सरस्वती भण्डार जिसमें सम्प्रदाय के सन्तों की वाणियाँ एवं सम्प्रदाय के आचार-नियम लिखित आलेख सुरक्षित हैं।      सरस्वती भण्डार के अतिरिक्त रामिनवास धाम में एक मुख्य भण्डार की व्यवस्था है। इस भण्डार में खाद्य सामग्री तथा वस्त्र आदि रखे जाते हैं। बाहर से आने वाले सन्तों एवं अन्य श्रद्धालु भक्तों के खाने-पीने आदि का प्रबन्ध यहीं से किया जाता है। ’रामनिवास’ बारहद्वारी के ठीक नीचे स्थित है जिसे नीचे जाकर देखा जा सकता है। उस स्थान पर एक स्तम्भ बना हुआ है जो ऊपर बारहद्वारी से सटा हुआ है। श्रद्धालु इस समाधि पर नतमस्तक होते हैं।
     इन सबके अतिरिक्त ’रामनिवास धाम’ में स्थित हैं श्री भण्डार, हरिनिवास, हिम्मत विलास, जग निवास, हवामहल, बादल महल, झरोखा, आचार्यों के समाधिस्थल (रामनिवास धाम के दक्षिण में) आचार्य रामचरण का साधनास्थल (रामनिवास धाम के समीप उत्तरी में ) तथा अन्य सन्तों के निवास। रामनिवास धाम के निर्माण काल के सम्बन्ध में बारहद्वारी के पश्चिमी स्तम्भ पर एक शिलालेख में लिखा है कि चैत्र पंचमी मंगलवार, सम्वत् 1895 में इसका निर्माण हुआ।
पुर-
     पुर का अर्थ होता है नगर। किसी समय पुर एक अलग कस्बा था किन्तु अब बढ़ती आबादी के कारण भीलवाड़ा नगर का ही एक उपनगर बन गया है। मेवाड़ राज्य के अधीन ’पुर’ एक परगना था जिस पर कई बार मुगल सेनाओं ने अपना अधिकार जमाया। कहते हैं कि उदयपुर के राणा की एक पुत्री पोपाबाई का विवाह ग्वालियर के किसी सरदार से हुआ था। तब यह गांव पोपाबाई को दहेज में दिया गया। पोपाबाई के ग्वालियर में रहने के कारण पुर को संभालने वाला कोई नहीं रहा। कारिंदों ने अपनी मन मर्जी करनी आरम्भ कर दी। राज्य की व्यवस्था यहां तक बिगड़ गई कि सब कोई अपनी मनमानी करने लगे। इसलिये मारवाड़ की तर्ज पर यहं भी पोपाबाई के राज वाली उक्ति प्रचलित हो गई । पुर प्राग्वाट राज्य की राजधानी, सम्राट सोमपर्व के अधिपत्य में, परमार राजाओं की राजधानी तथा तांत्या टोपे की आश्रय स्थली भी रही। पर्यटन की दृष्टि से पुर एक अच्छी जगह है। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर पुर में सर्वाधिक आकर्षित करने वाला स्थान है-अधर शिला। सैंकड़ों टन भारी लम्बी-चौड़ी काली चट्टान अधर में संतुलित है। इसके नीचे महादेव और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं। अधरशिला का वर्षाकालीन नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। भीलवाड़ा नगर विकास न्यास ने यहां फुलवारी एवं बगीचे विकसित किए हैं। नगर परिषद ने भी पर्यटकों की सुविधा हेतु निर्माण कार्य करवाया है। दोनों संसथाओं द्वारा किए गए प्रयासों से यह स्थल मुख्य सड़क मार्ग से भी जोड़ दिया गया है। अधरशिला स्थल पर किसी जमाने में जंगली जानवर बहुतायत में पाए जाते थे। यहां एक जल कुंड है जिसे मोर कुंड भी कहते हैं। पास में ही एक मठ बना हुआ है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी तांतिया टोपे ने अपनी फौजों सहित इस स्थान पर कुछ दिन पड़ाव डाला था।            पुर के दक्षिण में स्थित एक अन्य चट्टानी पर्वत ’देव डूंगरी’ पर बनी तीन छतरियां दूर से ही दर्शकों को आकर्षित करती हैं। इनमें सबसे बड़ी महाकालेश्वर उड़न छतरी एक हजार वर्ष पुरानी बताई जाती है। जनश्रुति के अनुसार कोई जैन यति आसमान में छतरी उड़ा कर ले जा रहा था तो एक तांत्रिक आचार्य ने अपनी तंत्र विद्या और तप के बल पर छतरी यहां उतार ली। इसके बाद दूसरे जैन यतियों ने यहां दो छतरियां और बनाईं। महाकालेश्वर छतरी में प्राचीन शिवलिंग और विक्रम सम्वत् 1890 का शिलालेख है। लाडूड़या पहाड़ी चोटी पर एक छतरी बनी हुई है। पुर के चारों तरफ अनेक छोट-बड़े तालाब हैं। सबसे बड़ा तालाब ’राज सरोवर’ कहलाता है। इस तालाब के बीचों-बीच एक छतरी बनी हुई है जो ई. 1231 में बनवाई गई थी। तालाब में ही एक हाथी भी बना हुआ है। राज सरोवर का प्राकृतिक दृश्य आकर्षक दिखता है। बस्ती से उत्तर  में थोड़ी दूरी पर शांत-एकांत वातावरण में  महदेव का स्थान भी देखने लायक है। पहाड़ी गुफा के भीतर भगवान शिव का मंदिर है। पेड़ों के झुरमुट में पक्षियों का कलरव और चन्द्राकार झील में हिलोरें लेता जल पिकनिक मनाने के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करता है। राज सरोवर तालाब की तरफ से जब बस्ती में प्रवेश करते है तब नृसिंह द्वारा आता है। करीब सौ साल पुराने नृसिंह द्वारे में भगवान राम का मंदिर है। यहां एक खाखी संत रहते हैं। पुर को पहचान दिलाने में यहां की प्रमुख कृषि उपज काली तम्बाकू की भी महŸवपूर्ण भूमिका रही है। पुर को पहलवानों का गांव भी कहते हैं। यहां सात-आठ व्यायामशालाएं और अखाड़े हैं।
मेजा बांध-
       भीलवाड़ा का मेजा बांध अपने प्राकृतिक परिवेश के कारण पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। इस बांध से भीलवाड़ा शहर को पेयजल वितरित किया जाता है। बांध की पाल पर बने खूबसूरत ग्रीन माउण्ट उद्यान एवं आसपास के नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण यहां वर्षा ऋतु में पर्यटकों का तांता लगा रहता है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत वर्ष 1952-53 में माण्डल तहसील के मेजा ग्राम के निकट से निकलने वाली कोठारी नदी पर इसके निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया जो वर्ष 1956-57 के अंत तक पूर्ण हो गया। लगभग 3,400 एम.सी.एफ.टी. जल क्षमता वाले इस बांध से भीलवाड़ा, माण्डल और बनेड़ा तहसील की इक्कीस हजार एकड़ से अधिक कृषि भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती है।                      भीलवाड़ा से मेजा बांध जाने के लिए दो रास्ते हैं। एक सीधा रास्ता पांसल, कोटड़ी होते हुए और दूसरा रास्ता माण्डल होते हुए जाता है। अधिकांश लोग पहले वाले मार्ग से ही जाना पंसद करते हैं क्योंकि हरी-भरी पहाडि़यों के बीच से गुजरते हुए इस रास्ते में ग्राम्य जन-जीवन की भी एक झलक मिलती है। बांध की तीन किलोमीटर लम्बी पाल के ऊपर पक्की सड़क बनी हुई है। पाल के बीचों बीच सिंचाई विभाग का छोटा किन्तु सुंदर विश्राम गृह बना हुआ है। यहीं पर ग्रीन माउण्ट पार्क है जिसमें पानी के फव्वारे और तरह-तरह की फुलवारी लगी है। सर्दियों के दिनों में यहाँ से हजारों कि्ंवटल मछली दिल्ली की मण्डियों में भेजी जाती है। गर्मियों के अधिकांश पानी सूख जाने के कारण यह तरबूज-खरबूज और खीरा-ककड़ी का खेत बन जाता है। संध्या समय मेजा बांध से सूर्यास्त का दृश्य विस्मयकारी होता है। रात में लहरों का स्वर और भी तेज हो जाता है। चांदनी रात में नौका विहार का आनन्द लिया सकता है। मेजा बांध के पश्चिमी छोर पर 42 फीट ऊंचा एवं 26 फीट चौड़ा भव्य जम्मेश्वर मंदिर दूर से नजर आता है। विश्नोई समाज के संत अज्ञानदास ने इसका निर्माण कराया। मंदिर की चोटी पर गुम्बद एवं चार छतरियां बनी हैं।सांगानेर-
     भीलवाड़ा नगर से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर सांगानेर का दुर्ग स्थित है जिसका निर्माण सत्रहवीं शती में मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) ने करवाया था तथा इसके पास एक सैनिक छावनी का निर्माण करवाया था। सांगानेर का दुर्ग कस्बे के दक्षिण की चट्टानों पर खड़ा है।  दुर्ग यद्यपि खण्डहर हो चला है किन्तु उसका परकोटा और कुछ अन्य भवन अब भी मजबूत दिखाई देते हैं। अठारहवीं औ उन्नीसवीं शताब्दियों में यह किला मेवाड़ राज्य के देवगढ़ तथा मेजा ठिकानों के अन्तर्गत आता था। सांगानेर कस्बे में चार भुजा नाथ का चार सौ वर्ष पुराना मंदिर, दो जैन मंदिर तथा रावला चौक में स्थापित गणेशजी की मूर्ति दर्शनीय हैं। इस चौक में पहले माच के ख्याल के उत्सव हुआ करते थे। अब यह कला लुप्त हो गई है। होली के अवसर पर गैर तथा दशहरे पर रामलीला इसी चौक में होती है। जयपुर जिले के सांगानेर कस्बे की भांति इस सांगानेर में भी किसी समय जुलाहे, छीपे तथा नीलगर बड़ी संख्या में रहते थे और कपड़ों की रंगाई-छपाई का काम बड़े पैमाने पर होता था।हमीरगढ़-
    भीलवाड़ा से 20 किलोमीटर दूर स्थित हमीरगढ़ दसवीं शताब्दी में बाकरोल के नाम से जाना जाता था। वि.सं. 1817 में धीरजसिंह ने इसका नाम हमीरगढ़ रखा। संवत् 1817 में महाराणा अरिसिंह के शासन काल में मराठों ने महाराणा से युद्ध का खर्चा मांगा। महाराणा ने उमरावों को एकत्र कर बैठक की। उमरावों ने युद्ध से बचने के लिए मराठों की सेना को खर्चा देने पर सहमति दी। इस पर लांगच गांव के ठाकुर धीरज सिंह ने कहा-मराठों को धन मत दीजिये। मुझे उनसे लड़ने की आज्ञा दीजिए मैं लड़ने के लिए तैयार हूँ। धीरज सिंह के साहस एवं शौर्य से प्रभावित होकर महाराणा ने धीरज सिंह को 26 गांवों की जागीरी दी। इसमें प्रमुख गांव बाकरोल था। धीरज सिंह बाकरोल किले में रहने लगा। उधर महाराणा अरिसिंह ने पत्र के जवाब में मराठों को लिखा कि अगर युद्ध ही करना है तो बाकरोल गांव के मैदान चले आना। धीरज सिंह ने बाकरोल गांव का नाम महाराणा अरिसिंह के ज्येष्ठ पुत्र हम्मीरसिंह के नाम से हमीरगढ़ रखा। कुछ दिनों के बाद मराठों ने युद्ध के लिए मोर्चाबंदी की।                  धीरजसिंह तथा उसके पुत्रों भवानी सिंह और अभयसिंह की फौज ने मराठों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। इस युद्ध में धीरजसिंह के दोनों पुत्र मारे गये। कहा जाता है कि उनके धड़ बिना सिर के काफी देर तक लड़ते रहे अन्त में उनके धड़ बरड़ोद गांव के समीप गिर गए। इस घटना के प्रमाण के तौर पर कन्याखेड़ी के पास जहां उनके सिर गिरे तथा बरड़ोद गांव के बादले के पास जहां उनके धड़ गिरे, दो अलग-अलग चबूतरे बनाए गए, जो आज भी मौजूद हैं।  धीरज सिंह की मृत्यु के उपरान्त उसका पौत्र वीरमदेव गद्दी पर बैठा। वीरमदेव भवानी सिंह का पुत्र था। उसके बाद राव सादुल सिहं तथा राव नाहरसिंह क्रमशः गद्दी पर बैठे। राव नाहर सिंह के कार्यकाल में कस्बे के चारों तरफ परकोटा चिनवाया एवं भीलवाड़ी दरवाजे सहित अन्य महतवपूर्ण निर्माण कार्य हुए। हमीरगढ़ में रेलवे स्टेशन बना। नाहर सिंह की पत्नी हाड़ी रानी ने तीन मंदिर तथा कलात्मक कुण्डों का निर्माण करवाया। संवत् 1923 सावण सुदी 11 बुधवार के दिन हमीरगढ़ के रंगाई छपाई व्यवसाय को संरक्षण देने के लिये छीपा एवं नीलगरों की मांग पर सांगोद तालाब में सिंगाड़ों की खेती पर पाबंदी लगाई। नाहर सिंह की मृत्यु पर मदनसिंह ने गद्दी संभाली।
             हमीरगढ़ के रावों की स्मृति में सांगोला तालाब पर आज भी सुन्दर छतरियां बनी हुई हैं। इसी पाल पर रघुनाथपुरा, शिवालय तथा कबीर द्वारा है। तालाब के ऊपर पहाड़ी है, जिसमें हनुमान जी का मंदिर है तथा दोनों तरफ पुरूष एवं महिलाओं के बरामदा युक्त घाट बने हुए हैं। किले की सुरम्य पहाड़ी के चारों तरफ फैले इस कस्बे में 30 मंदिर हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर तथा नृसिंह मंदिर कस्बे के प्रमुख मंदिरों में से है। हमीरगढ़ के दुर्ग से मंगरोप गांव तक 10 कि.मी. पहाड़ी श्रृंखला है, जो 5 कि.मी. चौड़ी है। वन विभाग द्वारा आरक्षित होने से सघन पेड़ों से ढकी हुई है। रेत गट्टी, फुट्टिया का तालाब, गुच्छी नाड़ी आदि जल स्त्रोतों में बारह महीने पानी सुलभ रहता है। इन्हीं पहाडि़यों में चावण्डा माता, बांस गोला महादेव, देवनाला आदि धार्मिक स्थल हैं। जंगल में हिरण, खरगोश तथा जंगली भेडिए मौजूद हैं।
        सांगोला तालाब के घाट पर हमीरगढ़ के शासकों की छतरियां स्थित हैं। यहां पांच छतरियां बनी हुई हैं जिनमें से तीन पूर्ण तथा दो अधूरी चबूतरे नुमा बनी हैं। दरगाह से छतरियां घाट जाने पर सर्वप्रथम रावधीरज सिंह की छतरी आती है, जिसने बांकरोल गांव को हमीरगढ़ के नाम से बसाया था। धीरजसिंह चित्तोड़गढ़ में किलेदार था जिसकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उदयपुर के महाराणा अरिसिंह ने छब्बीस गांवों की जागीरदारी प्रदान की। दूसरी छतरी छह खम्भों पर षट्कोण की आकृति में बनी है जिसके ऊपर गोल गुम्बद है। इस छतरी में महादेव, पार्वती की मूर्तियां हैं लेकिन नांदिया नहीं है। यह छतरी कंवर कालूसिंह की है। कालूसिंह रावत वीरम देव सिंह की पासवान मोतीबाई का पुत्र था। कालूसिंह की यह छतरी शिल्पकला की दृष्टि से आकर्षक है, लेकिन इसकी सीढियां जीर्णशीर्ण हो रही हैं। गुम्बद के भीतर की गोलाईनुमा दीवारों में कलात्मक फूल-पत्तियां बनी हैं, तीसरी छतरी अन्य छतरियों की भांति चबूतरे की कुर्सी पर स्थित है। यह शिल्पकला व नक्काशी की दृष्टि से अन्य छतरियों से श्रेष्ठ है। इसके गुम्बद के भीतरी भाग में पशु-पक्षियों, वनस्पतियों तथा राजा-रानियों को गुलाब भेंट करते हुए पत्थर पर बारीक खुदाई में चित्रण किया गया है। पहले पार्वती, महादेव एवं नांदिया सिंहासन पर आसीन थे। अब महादेव की मूर्ति का सिंहासन तो है लेकिन मूर्ति गायब है। वहीं नांदियां खंडित हो गया है, छत का छज्जा टूटा हुआ है। यह कलात्मक छतरी रावत नाहरसिंह की है जो संवत 2009 में जोधपुरी और हाड़ी रानी द्वारा बनाई गई। रावत नाहर के शासन काल में हमीरगढ़ कस्बे के चारों ओर दुश्मन से रक्षा हेतु खाई-परकोटा का निर्माण किया गया। चौथी छतरी अष्टकोण की आकृति में आठ खम्भों पर टिकी हुई है। इन आठों खम्भों के बीच चंद्राकार आकृति में दरवाजानुमा नक्काशी आकर्षक है। यह छतरी राव मदनसिंह की है। उसने अपनी पुत्री का विवाह डिग्गी के कुंवर अमरिंसह के साथ किया। यह विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ था। पांचवी छतरी आधी-अधूरी है। वह मोती बाई की है जहां मोतीबाई, (राव वीरमदेव की पासवान) उसकी पाग के साथ सती हुई थी। उसके एक हाथ में माला तथा दूसरे में तलवार थी। उसकी यह तलवार आज भी पूजी जाती है।
    सांगोला तालाब अब कमल तालाब कहलाता है। इस तालाब के दो तरफ पाल है। एक पाल के पास से चित्तोड़ दरवाजे से मांडलगढ़ जाने की सड़क है। वहीं हनुमानजी का मंदिर तथा सड़क के किनारे बस्ती बसी हुई है। दूसरी तरफ तालाब की मुख्य पाल है, जिस पर महिला घाट, विश्वनाथ घाट, कबीरद्वारा, रघुनाथद्वारा, सतीमाता तथा शिव मंदिर स्थित हैं।
बनेड़ा दुर्ग एवं महल-
    भीलवाड़ा से 25 किलोमीटर दूर स्थित बनेड़ा में प्राचीन दुर्ग, महल, कुंड़, बावडियां एवं देवालय दर्शनीय हैं। रियासती काल में बनेड़ा मेवाड़ राज्य के अधीन था। 1567 ई. में इसे अकबर ने छीन लिया। आईना-ए-अकबरी में इसे अजमेर सूबे की चित्तोड़ सरकार के 26 जिलों में से एक लिखा गया है। वर्ष 1681 के लगभग औरंगजेब ने राणा राजसिंह प्रथम के कनिष्ठ पुत्र भीमसिंह को यह जागीर प्रदान की। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह ने भीमसिंह के वंशजों को बनेड़ा से निकाल दिया, तत्पश्चात् उदयपुर के राणा राजसिंह द्वितीय की सहायता से बनेड़ा के जागीरदारों ने इसे पुन :प्राप्त किया, तभी से ये जागीरदार उदयपुर के सामन्तों में माने जाने लगे। इन जागीरदारों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे, जो उदयपुर रियासत के अन्य ठिकानेदारों को प्राप्त नहीं थे। जब बनेड़ा के ठिकानेदार ठिकाने की गद्दी पर बैठते थे तब उदयपुर से एक तलवार भेजी जाती  थी जिसे प्राप्त करने के बाद वे अधिष्ठापन के लिए उदयपुर जाते थे। जब बनेड़ा का राज उदयपुर जाता तो महाराणा नियत स्थात पर उसकी अगवानी करने तथा विदाई के समय उसके निवास पर विदाई देने आता था।            बनेड़ा में स्थित ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण राजा सरदारसिंह ने ज्येष्ठ कृष्णा 6 वि.सं. 1792 में आरम्भ करवाया। राजा रायसिंह ने गांव की अच्छी सुरक्षा के लिए महाराणा राजसिंह के नाम से राजपुर बनेड़ा बसाया जो  वर्तमान में स्थित है। बनेड़ा दुर्ग पर जाने के लिए मार्ग में पहले सिलहगढ़ दरवाजा, फिर भाला का दरवाजा और अंत में मुख्य प्रवेश द्वार आता है। भीतर बने महल मर्दाना महल, जनाना महल, मित्र निवास और कंवरपदा महल कहलाते हैं। हालांकि अब यहां कोई नहीं रहता लेकिन इनके भीतर संग्रहीत वस्तुओं में शामिल कलाकृतियां एवं चित्रकृतियां देखते ही बनती हैं। राजा सरदार सिंह ने इस दुर्ग में सरदार निवास महल बनवाया। चांदपोल की तरफ सरदार विलास बाग लगवाया। उसकी रानी नरूकीजी ने चतुर्भुज नारायण का मंदिर और उसके सामने कुंड बनवाया। राजा उदयसिंह के समय बनेड़ा दुर्ग में एक शीशमहल बना तथा श्रृंगार बुर्ज का निर्माण हुआ।      बस्ती से लगे राम सरोवर के किनारे हरा-भरा नजर बाग है और उसके भीतर अक्षय भवन कोठी है।              बनेड़ा में अनेक देवालय हैं, जिनमें चारभुजा मंदिर प्रमुख है। जैन मंदिर में ऋषभदेव की प्रतिमा है, जिसकी प्रतिष्ठा राजा हमीरसिंह के काल में वि.सं. 1840 में हुई। मंदिर में कुल 12 छोटी-बड़ी प्रतिमाएं है। मंदिर की भीतरी और बाहरी दीवारों पर भिŸाचित्र भी अंकित हैं। जैन मंदिर के पास ही है चारभुजा मंदिर। ये दोनों देवालय समकालीन हैं। चारभुजा मंदिर के सामने एक जलकुंड भी बना हुआ है। यहां के कुंड तथा बावडि़यों में खराकुंड, मानकुंड़, चोखी बावड़ी, बाई राज की बावड़ी आदि प्रमुख हैं। बाहर की तरफ बने घाटी के हनुमान जी और गूंदी के हनुमानजी नामक देवस्थल भी प्रसिद्ध हैं, जहां भजन-कीर्तन, गोठ आदि के कार्यक्रम होते रहते हैं। बनेड़ा में गणगौर की सवारी बड़ी धूमधाम से निकलती है। गांव के नर-नारी सज-धजकर उमंग एवं उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं। देवझूलनी ग्यारस पर देव विमान निकलते हैं, जो मानकुंड पर एकत्रित होते हैं। यहां देव स्नान, पूजा-अर्चना एवं भजन कीर्तन होते हैं। यहां का दशहरा मेला भी दर्शनीय है। तालाब के किनारे बनी रावण डूंगरी पर रावण का पुतला जलाया जाता है। बनेड़ा में रेजा बुनाई, जाजम बुनाई एवं रंगाई-छपाई का काम बड़े पैमाने पर होता है।यहाँ 18 वीं शती के जैन मंदिर में प्रवेश द्वार के ऊपर बने भित्ति-चित्रों में धार्मिक चित्रों का सर्वथा अभाव है। श्रृंगार चित्रों में बीजा-सोरठ, लैला-मजनूं, शुक-नायिका, प्रेमी युग्म तथा रत्नावली से मिलने जाते तुलसीदास जी द्वारा सांप को रस्सी समझ कर छत पर चढ़ने वाले दृश्य का चित्रण है। स्त्री से शिक्षा पाकर योगी बने तुलसीदास जी का चित्र भी चित्रित है। एक ऐसा जन्तु (व्याल) भी यहां बना है जिसके पैरों के पंजे शेर के हैं मुख हाथी का है और वह अपने पंजों, मुख व पूंछ में एक एक हाथी पकड़े हुए है। इसे राजस्थान में ’अनहडपंखगजचार’ नाम से भी जाना जाता है और इसका रूपांकन लघुचित्रों व-पाषाण मूर्तियों में भी देखा गया है। इसके पंख भी हैं और गरूड़ द्वारा इसे दबोचे जाने का भाव यहां चित्रित है। राजस्थानी कला में इसका अंकन महतत्वपूर्ण है, इस चित्र में बादलों को गजरूप में दिखाया गया है, जिसका तात्पर्य यह लिया जा सकता है कि काल रूपी व्याल ने बादलों को दबोच लिया और वर्षा नहीं होने दी जो अकाल का कारण बनता है।
बागोर-
      भीलवाड़ा से 40 किलोमीटर पश्चिम में स्थित बागोर कोठारी नदी के तट पर बसा है। यहां प्राचीन पुरावशेष, प्रतिमाए, गढ़ एवं भवनों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। बस्ती से एक किलोमीटर पूर्व में ’महासतियों का टीला’ नाम का स्थल पाषाण कालीन अवशेषों के कारण विश्वविख्यात है। 1967-68 में हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी के डॉ. लेस्निक, डक्कन कॉलेज पूना के डॉ. वीरेन्द्रनाथ मिश्रा एवं डॉ. हंसमुख धी. सांकलिया जैसे पुरातत्व वेत्ताओं के मार्गदर्शन में संयुक्त रूप से उत्खनन सम्पन्न हुआ था जिनके अनुसार यहां की सभ्यता ईसा पूर्व 4500 से ईसा पूर्व 2000 तक की मानी गई है। हड़प्पा एवं मेसोपोटामिया की संस्कृतियों से इसका संबंध प्रमाणित हो गया है। उत्खनन में पाए गए आवासों से यह भी प्रमाणित हुआ कि यहां कम से कम ईसा से 4500 वर्ष पूर्व मानव का आवास था। बागोर के आसपास ही कोठारी नदी के तट पर बसे ग्राम ’बावलास’ एवं ’माणक्यास’ भी पुरातत्व की दृष्टि से काफी समृद्ध हैं। बागोर में महासतियां के टीले पर, जहां पुरातत्व वेतओं ने उत्खनन करवाया था, वहां खनन स्थलों को पोलीथीन का कपड़ा बिछा कर पुनः मिट्टी से ढक दिया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर आगे और खनन कार्य कराने में सुविधा रहे तथा क्रमबद्धता बनी रहे।
      मेवाड़ राज्य के संचालन में बागोर की महतवपूर्ण भूमिका रही है। मेवाड़ की राजगद्दी पर बागोर से चार महाराणा गोद गए हैं। महाराणा सरदार सिंह-1838, महाराणा स्वरूप सिंह 1842, महाराणा शम्भूसिंह 1861 और महाराणा सज्जन सिंह 1874 में सिंहासनारूढ़ हुए। मेवाड़ की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से भी बागोर का गहरा सम्बन्ध रहा है। मेवाड़ की प्राचीन राजधानी एवं पर्यटन नगरी उदयपुन में गणगौर घाट पर स्थित ’बागोर की हवेली’ में देश के चार राज्यों-गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहरों के उत्थान के लिए स्थापित पश्चिम क्षेत्र-सांस्कृतिक केन्द्र का प्रधान कार्यालय है। इस हवेली की कलात्मकता एवं विशालता दर्शनीय है। बागोर अभ्रक बहुल क्षेत्र के मध्य स्थित है तथा इसके आसपास अभ्रक की महत्वपूर्ण खदानें हैं। कोठारी नदी के तट पर स्थित रामदेव जी के मंदिर पर जलझूलनी एकादशी को तीन दिवसीय मेला भरता है जिसमें सैकड़ों निर्गुणी भजन गायक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। श्रेष्ठ गायकों को पुरस्कार दिये जाते हैं। आमली एवं लक्ष्मणगढ़ में सांसी व कंजर जन जातियों के लोग रहते हैं जिनकी जीवन शैली, सांस्कृतिक परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों पर शोध करने समाज शास्त्री आते रहते हैं। यहां से प्राप्त सूर्य पुत्र रेवन्त की प्रतिमा भी काफी महत्वपूर्ण है।                बागोर के निकट चांदरास ग्राम स्थित है। यह गांव पूर्व में ठिकाना बदनोर के अन्तर्गत था। गांव के पास एक खेत में ऊंचे चबूतरे पर छह स्तम्भों पर आधारित एक छतरी खोजी गई है। स्थानीय लोग इसे श्रीपति देवपुरा की स्मृति मानते हैं। इस छतरी की गोल गुम्बद में नंदी व सिंह पर सवर क्रमशः शिव व दुर्गा मोर, गोपियों को माला देते व राधा की प्रतीक्षा करते कृष्ण और गणेश चित्रित हैं। यद्यपि  इन चित्रों के रंग अब फीके पड़ गए हैं परन्तु इनका रेखा कार्य 17 वीं सदी की मेवाड़ी चित्रकला का सुन्दर उदाहरण है।
मेनाल
        भीलवाड़ा जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर मेनाल के कलात्मक मंदिर अपनी स्थापत्य एवं मूतिकला से सभी का मनमोह लेते हैं। इन मंदिरों का निर्माण मध्यकाल में होना बताया जाता है। बताया जाता है कि इस क्षेत्र में प्रतिहार, चौहान एवं गुहिल शासकों का प्रभाव रहा। मेनाल मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए दूर से ही दो मंजिला कलात्मक प्रवेश द्वार नजर आता है, जो सुन्दर व कलात्मक मूर्तियों से सुसज्ज्ति है। द्वार से प्रवेश करने पर परिसर के पश्चिम बने छोटे-छोटे देवालयों के शिखर ढह गये हैं और मूर्तियां खण्डित हो गई हैं तथा गर्भगृह सूने नजर आते हैं। इन मंदिरों के इधर-उधर बिखरे हुए कलात्मक अवशेष मंदिरों के भव्य अतीत की कहानी सुनाते हैं।मंदिर प्रांगण के बांई ओर निर्मित महानालेश्वर मंदिर का शिल्प देखते ही बनता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर धरातल से करीब 5 फीट ऊंची जगती पर निर्मित है। पश्चिममुखी भव्य मंदिर के अग्रभाग में द्वारमण्डप, मध्यभाग में सभामण्डप एवं आखिर में गर्भगृह बने हैं। गर्भगृह में पाषाण के आसन पर भगवान शिव की प्रतिमा विराजित है।महानालेश्वर मंदिर का उन्नत शिखर दूर से आकर्षित करता है। सभामण्डप में बड़े आकार के खंभों पर कीर्तिमुख, पत्रलता, कमल एवं घण्टिका आदि नजर आते हैं। सभामण्डप कई खण्डों में विभाजित है जिनकी छतां पर कारीगरों ने पौराणिक कथानकों को चित्रित किया है। गर्भगृह का द्वारखण्ड अत्यन्त कारीगरी पूर्ण बना है। द्वार मण्डप के सम्मुख एक वर्गाकार स्वतंत्र मण्डप में भगवानशंकर के वाहन नन्दी की विशाल प्रतिमा दर्शनीय है।मंदिर के वेदीबंद पर देव मूर्तियां व सामन्य जीवन की मूर्तियों के साथ गज मूर्तिया उंकेरी गई हैं। मंदिर के शिखर एवं जंघा के मध्यभाग में अप्सराओं, शार्दूलों एवं भगवानशंकर के विविद्ध रूपों का अंकन किया गया है। प्रतिमाएं उत्कृष्ट अंलकरण, शारीरिक सौष्ठव एवं भावभंगीमाएं लिए तराशी गई हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर यक्ष, किन्नर, नर-नारी की युग्म प्रतिमायें तथा देवी-देवताओं की प्रतिमाएं नजर आती हैं। नीचे की कतार में जुलूस एवं शिकार के दृश्य अंकित हैं।परिसर में तीन लघु देवालय भी बने हैं जो प्रतिहार कालीन कला का नमूना हैं और इन्हें आठवीं-नवीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। तीनों मंदिरों का आयताकार सभामण्डप है। मण्डप के स्तंभों पर घटपल्लव तथा पत्रलता आदि का अंकन नजर आता है। इनके शिखर खण्डित हो चुके हैं।           देवालयों के पास ही तीन समाधियां एवं एक पानी की बावड़ी बनी है। गोलाकार बावडी की बाहरी दीवार पर खूबसूरत नक्काशी की गई है।मेनाल जल प्रपातमेनाल के मंदिर परिसर के समीप प्रवाहित होने वाली मेनाली नदी की जलधारा जब एक गहरी घाटी से होकर झरने के रूप में गिरती है तो यहां का दृश्य अत्यन्त मनोहारी हो जाता है। प्राकृतिक सौन्दर्य से घिरे जलप्रपात के इस स्थल को पर्यटक घण्टों निहारते रहते हैं।मेनाल मंदिरों के समीप ही तिलस्वां महादेव तथा जोगणिया माता के मंदिर भी दर्शनीय हैं। बरसात ऋतु में मेनाल की छंटा निराली और मनमोहक होने से यह ऋतु यहां आने के लिए सर्वथा अनुकुल है। यहां जुलाई से अक्टूबर माह में बड़ी संख्या सैलानी मंदिरों व जलप्रपात के मोहक दृश्यों को देखने के लिए आते है।
मांडलगढ़
  राजस्थान के इतिहास में पहचान बनाने वाला मांडलगढ़ का दुर्ग जर्जर होने पर भी गौखमयी अतीत का साक्षी है। अरावली पहाड़ी पर स्थित मंडलकृति वृत्ताकार वाला दुर्ग शहर के उत्तर में परकोटो से घिरा सुरक्षा की दृष्टि से अजेय था एवं इसका सामरिक महत्व रहा है। दुर्ग निर्माण के संबध में अनेक किंवदतियां प्रचलित हैं। माना जाता है यह जिला अजमेर के चौहान शासकों के राज्य में था अकबर ने 1624 ई़ में इस पर कब्जा किया था। सातद्वार वाले मार्ग से दुर्ग में प्रवेश करने से पूर्व बिसोत माता का मंदिर है। दुर्ग में बने भवनों में हिंदू मुस्लिम शैली का मिश्रण देखा जा सकता है। यहां चारभुजा मंदिर, उदेश्वर मंदिर, दिगम्बर जैन मंदिर एवं ऋषभदेव के प्रमुख मंदिर बने हैं। दुर्ग में बनी बुर्जो का उपयोग युद्ध के समय तोपें, बंदूक एंव तीर चलाने में किया जाता था। तोपखाना एवं कचहरी आदि भवनों के अवशेष भी पाये जाते हैं। पेयजल के लिए बनाये गये सामर एंव सागरी कुंड आज भी पानी से भरे रहते हैं। मांडलगढ़ में जालेश्वर तालाब के किनारे बनी अमरचंद मेहता की छतरी, गाय़त्री मंदिर एवं जालेश्वर मंदिर दर्शनीय हैं। मांडलगढ़ से करीब 2 कि.मी. दूर पहाडी की गोद में स्थित गुप्तेश्वर महादेव का गुप्त कालीन मंदिर प्रकृति एवं भक्ति का संगम स्थल हैं। यहां हजारेश्वर शिंललिगं बना है तथा बरसात में पहाड़ से गिरता झरना अत्यंत मनभावन दृश्य उत्पन्न करता हैं।
बिजौलिया
     भीलवाड़ा जिले में स्थित क्षेत्र पर 9 मंदिर एवं 2 मान स्तम्भ हैं। क्षेत्र पर प्राचीन देवालय अत्यन्त कलात्मक हैं तथा मूर्ति शिल्प दर्शनीय है। यहां पार्श्वनाथ मंदिर के अलावा 4 कोनों पर 4 देवरियां हैं। भव्य चौबिसी एवं समोशरण रचना भी बनी है। गर्भगृह में पंचायतन शैली में निर्मित है। मंदिर का निर्माण अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के समय 1170 ईस्वी में एक महाजन लाला द्वारा करवाया गया था। इस स्थान को तपोभूमि माना जाता है। बताया जाता है कि विक्रम संवत 1226में उज्जैन के एक प्रसिद्ध व्यापारी लोडक यहां आए और स्वप्न में प्राचीन प्रतिमा भगवान पार्श्वनाथ की जमीन में होने के दर्शन हुए। प्रातःकाल स्वप्न के अनुरूप जब उन्होंने एक तालाब के किनारे खुदाई करवाई तो खुदाई में भगवान पार्श्वनाथ की आकर्षक प्राचीन प्रतिमा के साथ-साथ देवी अंबिका, पदमावती, धार्णेन्द्र एवं क्षेत्रपाल की प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई। यह मंदिर विक्रम संवत 1226में ही पूर्ण किया गया तथा इन प्रतिमाओं को यहां प्रतिस्थापित किया गया। राष्ट्रीय राजमार्ग 27 के समीप रेवा नदी के तट पर विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख है, जिसमें 292 श्लोक अंकित हैं। नगर में 3 मंदिर व एक धर्मशाला है। यह क्षेत्र बून्दी से 45 किमी, भीलवाड़ा से 85 किमी, चंवलेश्वर से 65 किमी, चित्तौडगढ़ से 251 किमी है। कोटा-चित्तौड़-बून्दी से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
शाहपुरा
    फड चित्र कला के लिए विख्यात शाहपुरा राजमहलों, मंदिरों,बगीचों तथा झीलों वाला रमाणिक स्थल है। यहां स्वतंत्रता सेनानी बारहठ केसरी सिंह की हवेली स्थित है जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अप्रतिम योगदान दिया । यह हवेली संरक्षित स्मारक घोषित की गई है तथा बस स्टेण्ड पर त्रिमूर्ति शहीद स्मारक बना है। यहां दुनिया में विख्यात रामस्नेही  संप्रदाय की मुख्य पीठ हैं। एक मजबूत पर कोटे से घिरे शहर में राजाओं के राजमहल बने हैं। कमल तालाब के साथ-साथ कलात्मक बावडि़यां एवं जलकुंड दर्शनीय हैं। देश में पाये जाने वाले  राम स्नेही संप्रदाय के रामद्वारों का मुख्य केन्द्र शाहपुरा है। राम निवासधाम गुरूद्वारा सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है। इसकी कारीगरी देखते ही बनती हैं। यहां प्रतिवर्ष मार्च-अप्रेल में चैत्र बद्री प्रतिपदा से पांच दिवसीय राष्ट्रीय स्तर का फूल डोल मेला आयोजित किया जाता हैं। बताया जाता है यहां चांदी के सिक्के ढालने की टकसाल थी जिसे 6 अक्टूबर 1870 के ब्रिटिश सरकार ने बंद कर दिया। शाहपुरा तहसील में फूलिया कला गांव के समीप मानसी एवं खारी नदी के किनारे पर स्थित धानेश्वर को लघु पुष्कर कहा जाता है यहां श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर विशेष कर दर्शनीय हैं। कला जगत में यह स्थान विश्व प्रसिद्ध फड़ चित्रकला के कारण जाना जाता है। शाहपुरा से 30 किमी. उत्तर-पूर्व में करीब 1100 वर्ष पुराना घनोप माता का मंदिर है। नवरात्रा पर यहॉ मेला लगता है।
जहाजपुर
    भीलवाड़ा-देवली मार्ग पर देवली के समीप स्थित जहाजपुर के प्राचान दुर्ग एवं खण्डहरों से यहां मौर्यकालीन होने के प्रमाण मिले है। सम्राट अशोक के पोत्र सम्प्रति ने दुर्ग का निर्माण कराया था। वह जैन मत मानता था अतः यहां जैनी बस गये होगें। आस पास जैन मंदिरों के अवशेष पाये जाते हैं मघ्यकाल में महाराणा कुंभ ने दुर्ग का जीर्णोंद्वार कराया था। दुर्ग में दोहरा परकोटा, खाई एवं बुर्जें बनी है। सर्वेश्वर नाथ मंदिर एवं कुछ अन्य मंदिर भी दुर्ग में बने हैं। दुर्ग एवं शहर के मध्य गैबीपीर की मस्जिद  विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
आसींद
       भीलवाड़ा शहर से लगभग 55 किलोमीटर दूर ब्यावर मार्ग पर आसींद कस्बे में स्थित सवाईभोज मंदिर गुर्जर समाज का प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थल है। भारत सरकार के डाक तार विभाग द्वारा वर्ष 2011 में सवाईभोज पर एक आकर्षक डाक टिकट भी जारी किया गया। जिस स्थान पर सवाईभोज का पवित्र तीर्थ क्षेत्र है उसका प्राचीन नाम गौष्ठ  दडावट हुआ करता था। कहते हैं कि यहां के राजा दुर्जन शाल व बगड़ावतां के बीच युद्ध हुआ था। सवाईभोज मंदिर के पास ही राठौडा तालाब है। जिसे प्रेमसागर भी कहते हैं। सवाईभोज के प्राचीन मंदिर के निकट ही नया विशाल मंदिर बना हुआ है। इसके अतिरिक्त यहां दस और छोटे-बडे मंदिर हैं। इन मंदिरों पर फहराते रंग बिरंगे देव ध्वज दूर से ही आकर्षक लगते हैं। सवाईभोज मंदिर में देश भर से यात्रीगण आते हैं। हर वर्ष भादवीं छठ और माघ सप्तमी पर यहां विशाल मेला लगता है।
मांडल
          प्राचीन समय से यह कस्बा पुरातत्व धर्म एवं संस्कृति का केन्द्र रहा है। प्रमुख आकर्षण ऊँची पहाड़ी पर बना मींदारा है। करीब एक हजार वर्ष पुराने मीनार स्मारक की सुन्दरता जीर्णोद्वार के बाद बढ़ गई है। इसके साथ ही दक्षिणी जगदंबा का प्राचीन मंदिर बना है। मेवाड़ के महाराणा समर सिंह ने इनका निर्माण कराया था। मींदारा 85 फुट ऊॅचा पांच खण्डा में अष्टकोणीय संरचना है। इसकी चौड़ाई वर्गाकार में 72 फुट है। ऊपर गोल गुम्बद है। यहां जगन्नाथ कछवाह की बत्तीस खंबों की छतरी एवं नीलकंठ महादेव का मंदिर सहित पुरातत्व महत्व के कई स्थल दर्शनीय हैं। यहां नाहर का स्वांग एवं नृत्य प्रसिद्ध है।
         मांडल तहसील के लादूवास ग्राम जिले में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है। इस संप्रदाय के 84 छोटे-बड़े आसणों का मुख्य केन्द्र है। भीलवाड़ा से पूर्व में 50 किमी. दूर है और मांडल-बेमाली सड़क मार्ग से जुड़ा है। आसण गढ़ के रूप में है। समीप ही चौमुखानाथ महादेव का मंदिर है। यहाँ का गैर नृत्य प्रसिद्ध है तथा भीलों की कई टोलियां गवरी नृत्य करती हैं। यहाँ शिवरात्रि पर मेला भी भरता है।