भारत मांगे पूर्ण आजादी 

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गीतांजलि पोस्ट (आलेख – चन्द्रपाल प्रजापति नोएडा)

पिछले एक हजार वर्ष में भारत के कई विभाजन हुए। पर 1947 का विभाजन हमारी स्मृतियों को बहुत अधिक व्यथित करता है। हंगामा, अफरातफरी, हिंसा और अव्यवस्था की आंधियों के बीच ही पाकिस्तान नाम के एक नये देश का जन्म हुआ। पश्चिमी भाग में आठ लाख वर्ग किलोमीटर पर पाकिस्तान तथा पूर्वी भाग में 1.5 लाख वर्ग किलोमीटर में पू॰ पाकिस्तान बना दिया गया। लगभग 1.50 करोड़ हिन्दू इन क्षेत्रों से शरण लेने आये। कुल लगभग 20 लाख हत्याएं हुईं। भारत के बंटवारे का दंश सबसे ज्यादा महिलाओं ने झेला। यह बटवारा मां बहनो की घोर अवमानना से कलंकित था। साथ ही लाखो माता बहनों के अपहरण, क्रय – विक्रय जैसे अकथनीय अपराध ने मानवता को कलंकित कर डाला। अनुमान है कि इस दौरान 75 हजार से एक लाख महिलाओं का अपहरण हत्या और बलात्कार हुआ। इतना ही नहीं भारत की महिलाओं को जबरन शादी, गुलामी और जख्म इस बटवारे से मिला। भारत द्वारा न्यायमूर्ति जी॰ डी॰ खोसला के माध्यम से कराये गए सर्वेक्षण ” द स्टर्न रैकमिंग ” के अनुसार भी 10 लाख की जनहानि का अनुमानित आंकड़ा है।
भारत विभाजन से पूर्व के दो वर्ष (1946-1947) भारतीय राजनीति का परिवर्तनकारी मोड़ थे। इस समय कांग्रेसी नेता चुनाव में वोट मांग रहे थे। इसके जवाब में हिन्दू महासभा के नेता कह रहे थे कि “सावधान! आज कांग्रेसी अखण्ड भारत का नारा लगाकर तुम्हारे वोट मांग रहे हैं, कल चुनाव के पश्चात, पाकिस्तान का समर्थन कर, विश्वासघात करेंगे। वे केवल भारत विभाजन के लिए कार्य करेंगे।” डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वतंत्रता से पूर्व साम्प्रदायिकता के आधार पर राज्यों का गठन, हिन्दुओं और मुसलमानों की बराबरी तथा पाकिस्तान के निर्माण का जबरदस्त विरोध किया। उन्होंने लार्ड वेवल की योजना को अस्वीकार किया। प्रो. क्प्लैण्ड ने स्पष्ट लिखा है कि इसी विरोध के कारण लार्ड वेवल ने शिमला कांफ्रेस में हिन्दू महासभा को आमंत्रित नहीं किया। हिन्दू महासभा ने अपने विलासपुर अधिवेशन में “एक व्यक्ति एक वोट” तथा समान नागरिकता की बात कही, 16 जून, 1946 को हिन्दू महासभा ने अपने प्रस्ताव में एक मजबूत केन्द्रीय शासन तथा जनसंख्या के आधार पर अंतरिम सरकार की स्थापना के लिए कहा। कैबिनेट मिशन के भारत आगमन पर जहां भारत की कम्युनिस्ट पार्टी न केवल पाकिस्तान की मांग का, जिन्ना से भी अधिक समर्थन कर रही थी तथा अपने सुझावों में भारत को 16-17 टुकड़ों में बांटने की बात कर रही थी, तब कांग्रेस पूरी तरह से निष्क्रिय थी। केवल हिन्दू महासभा ही विरोध कर रही
समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने भी अपनी किताब ‘गिल्टी मेन ऑफ़ पार्टिशन’ में लिखा है कि कई बड़े कांग्रेसी नेता जिनमें नेहरू भी शामिल थे वे सत्ता के भूखे थे जिनकी वजह से बँटवारा हुआ। नामी-गिरामी इतिहासकार बिपन चंद्रा ने विभाजन के लिए मुसलमानों की सांप्रदायिकता को ज़िम्मेदार ठहराया है जबकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1937 के बाद कांग्रेस मुसलमान जनमानस को अपने साथ लेकर चलने में नाकाम रही इसलिए विभाजन हुआ। कांग्रेस ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भारत के वामपंथियों के सहयोग तथा मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति तो अपनाई ही, हिन्दू समाज तथा हिन्दू संगठनों की भूमिका को योजनाबद्ध ढंग से सिर्फ अनदेखा ही नहीं किया बल्कि उन पर “अंग्रेजों के पिट्ठू” “विभाजन के पोषक” “फासिस्ट” “साम्प्रदायिक” आदि झूठे आरोप भी लगाए। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या उस लम्बे राजनीतिक आन्दोलन में भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज मूकदर्शक रहकर भारत का विभाजन देखता रहा? 23 जून, 1947 को बंगाल हिन्दू सभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मल चन्द चटर्जी ने दिल्ली के चांदनी चौक में बोलते हुए कहा कि “आज की अवस्था, ब्रिटिश का जिन्ना के साथ षड्यंत्र तथा कांग्रेस की कायरता का परिणाम है।” 15 अगस्त को उन्होंने “शोक दिवस” मनाया। वीर सावरकर ने कहा, कांग्रेस कहती है कि विभाजन स्वीकार कर देश को रक्तपात से बचाया। लेकिन सही तो यह है कि जब तक पाकिस्तान रहेगा, पुन: रक्तपात का खतरा बना रहेगा।
कुल मिलाकर, बँटवारा एक ऐसा मामला है जिसमें सब लोग ये ढूँढने की कोशिश करते हैं कि ज़िम्मेदार कौन है, लेकिन समझने की बात है कि इतनी बड़ी घटना के पीछे एक व्यक्ति नहीं बल्कि बहुत सारी शक्तियाँ काम कर रही होती हैं। भारत का विभाजन एक जटिल मामला है जिसके लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहराना नासमझी है। ये सच है कि मुस्लिम लीग ने अलग देश की माँग की थी और उनकी ये माँग पूरी हो गई, यही वजह है कि विभाजन का पूरा दोष मुसलमानों पर डाल दिया गया, लेकिन ऐसा नहीं है सभी मुसलमान विभाजन के पक्ष में थे या केवल मुसलमान ही इसके लिए ज़िम्मेदार थे. मौलाना आज़ाद और ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान विभाजन के सबसे बड़े विरोधी थे और उन्होंने इसके ख़िलाफ़ पुरज़ोर तरीक़े से आवाज़ उठाई थी, लेकिन उनके अलावा इमारत-ए-शरिया के मौलाना सज्जाद, मौलाना हाफ़िज़-उर-रहमान, तुफ़ैल अहमद मंगलौरी जैसे कई और लोग थे जिन्होंने बहुत सक्रियता के साथ मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति का विरोध किया था।
भाषा, पंथ, सम्प्रदाय ऐसे अनेक भेद होते हुए भी हम सब भारतीयों को एकात्म, एकरस और एकसंघ राष्ट्रजीवन की तरह जीना आना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि विस्तार चेतना का लक्षण है। आकुंचन मूर्च्छा या मृत्यु का। तो क्या यह राष्ट्र अब असंदिग्ध शब्दों में अपनी चैतन्य युक्तता का परिचय देते हुए कहेगा कि विभाजन आगे और नहीं? और इससे भी बड़ा सवाल, भूतकाल में हुए विभाजनों को निरस्त करने की शुरुआत होगी? यह भारतभूमि एक दिव्य चेतना वाली भूमि है। यह सर्वेश की सगुन साकार मूर्ति है और मूर्ति का खंडित रहना अस्वीकार्य है। अखंड भारत ही सच्चा भारत है। वही हर भारत आराधक के दिल में बसा है। मानचित्र में दिखने वाला विभाजन पूरी तरह अप्राकृतिक है। हमारे दिलों में बसी अखंड प्रतिमा भू पर भी हम अवतरित करेंगे, यह संकल्प हमें लेना होगा। अब समय आ गया है कि हम सब एक होकर अखंड भारत की मांग करें और उसे साकार करने के लिए प्रयासरत हों।

चन्द्रपाल प्रजापति, नोएडा