इतिहास के आईने में लूणकरणसर

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गीतांजलि पोस्ट (श्रेयांस ) लूणकरणसर:-

राव लूणकरण को आधुनिक युग का कर्ण भी कहा जाता है।

बीकानेर के यशस्वी शासक राव लूणकरण के दरबार में एक दरबारी हुआ करता था ।

लाला चारण ….

लाला चारण एक बार किसी कार्य से जैसलमेर जाता है तो वहां के भाटी शासक रावळ जैतसी भाटी से मुलाकात करता है …. रावळ जैतसी बातों ही बातों में लाला चारण के सामने मारवाड़ (जोधपुर) और बीकानेर के राठोड़ों का उपहास उड़ा देता है ….

लाला चारण रावळ जैतसी से कहता है …. हुकुम आप राठोड़ों के बारे में ऐसा मत बोलो राठौड़ बिगड़ जाते हैं और जब अपनी पे आते हैं तो बड़े बुरे होते हैं ….

जैतसी लाला चारण से कहते हैं …. जा के कह दो अपने राव लूणकरण से कि है दम तो मेरे राज्य (जैसलमेर) में अपने घोड़े दौड़ा के दिखा दे …. जहां जहां तक राठोड़ों के घोड़े दौड़ेंगे वहां वहां तक भूमि मैं ब्राह्मणों को दान दे दूंगा ….

अपमान की पीड़ा में धधकता लाला चारण तुरन्त बीकानेर लौट के अपने राजा लूणकरण को पूरा वाक्या सुनाता है ….

राव लूणकरण अपनी विशाल फौजों के साथ जैसलमेर रावळ जैतसी पे चढ़ाई करते हैं और ना सिर्फ जैतसी को पराजित करते हैं बल्कि उसे बन्दी भी बना लेते हैं ….

क्षमादान मांगने पे लूणकरण जैतसी को क्षमा कर के उसका राज्य वापस लौटा देते हैं …. इसपे जैतसी अपनी सभी पुत्रियों का विवाह लूणकरण के सभी पुत्रों से करवा देता है ….

ईसवी सन 1504 में बीकानेर शहर व रियासत के संस्थापक राव बीका के देहांत के पश्चात उनका ज्येष्ठ पुत्र नरा बीकानेर पे सत्ताशीन होता है …. दुर्भाग्य से सत्तारूढ़ होने के कुछ माह बाद ही नरा का भी देहांत हो जाता है ….

निसंतान नरा के देहांत के पश्चात उसका छोटा भाई और राव बीका का छोटा पुत्र लूणकरण 23 जनवरी 1505 को बीकानेर का अगला शासक बनता है ….

लूणकरण की मां का नाम रंग-कंवर होता है वो पूंगलगढ़ (बीकानेर का एक ठिकाणा) के शासक राव शेखा की पुत्री होती है ….

एक ही वर्ष के अंतराल में नव-निर्मित विशाल साम्राज्य बीकानेर के संस्थापक़ राव बीका और अगले शासक राव नरा की मृत्यु और उसके बाद राव लूणकरण की ताजपोशी के कारण ये बीकानेर में राजनीतिक अस्थिरता का दौर था …. विद्रोही जगह जगह सर उठाने लगे थे ….

महापराक्रमी व शूरवीर लूणकरण ने अपनी वीरता साहस शौर्य पराक्रम व सूझबूझ से ना सिर्फ अपने विरुद्ध हो रहे षड्यंत्रों को विफल किया बल्कि समस्त विद्रोहियों का फन कुचलते हुए और अपने पिता स्वर्गीय बीका के मार्ग पे चलते हुए अपने साम्राज्य का विस्तार दूर दूर तक किया ….

एक के बाद एक सफल सैन्य अभियानों को अंजाम देते हुए लूणकरण ने बीकानेर की सरहदों का विस्तार दूर दूर तक कर दिया ….

23 सितम्बर 1509 को लूणकरण ने ददरेवा (लोकदेवता गोगाजी चौहान की जन्मस्थली जिला चुरू) के शासक मानसिंह चौहान को पराजित कर के विशाल ददरेवा परगने को बीकानेर रियासत में मिला दिया और ददरेवा में अपने थाणो (चौकियों) की स्थापना कर दी ….

22 अप्रैल 1512 को लूणकरण ने फतेहपुर (जैसलमेर) के कायमखानी मुस्लिम शासकों दौलत खां और रंग खां को परास्त करते हुए वहां के 120 गांवों पे अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और जगह जगह अपने थाणे स्थापित कर दिए ताकि इस क्षेत्र में कायमखानी दुबारा मजबूत ना हो ….

1513 में नागौर के शासक मुहम्मद खान ने जब अपनी विशाल फौजों के साथ बीकानेर पे आक्रमण किया तो लूणकरण ने ना सिर्फ उसे करारी शिकस्त दी बल्कि मुहम्मद खान को गंभीर घायल हो के वापस उल्टे पांव नागौर लौटना पड़ा ….

1514 में लूणकरण ने चायलवाड़ा (सिरसा हिसार के क्षेत्र) के शासक पूना को परास्त कर के वहां के 440 गांवों पे बीकानेर का आधिपत्य स्थापित कर दिया और जगह जगह अपने थाणो की स्थापना कर दी …. घायल पूना को भग के भटनेर (हनुमानगढ़/राजस्थान) में शरणागत होना पड़ा ….

राव लूणकरण की बढ़ती ताकत प्रभाव वर्चस्व और बढ़ते साम्राज्य को देख के राजपूताने के अन्य शासकों के माथे पे चिंता की लकीरें उभरने लगी …. कुछ शासक अब राव लूणकरण को रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगे ….

राव लूणकरण का अंतिम सैन्य अभियान 1526 में नारनोल के शासक शेख-अबीमीरा के विरुद्ध शुरू हुआ ….

इस युद्ध को ढोंसी अथवा ढोंसा का युद्ध कहा जाता है ….

राव लूणकरण की विशाल फौजों को देख के शेख-अबीमीरा ने उनको संधि प्रस्ताव भेजा जिसे लूणकरण ने ठुकरा दिया ….

किन्तु ….

लूणकरण की सेना के ही छापर/द्रौणपुर के शासक कल्याणमल …. अमरसर के शासक रायमल शेखावत और पाटन के तंवरों एवं अन्य राजपूत शासकों ने इस युद्ध में लूणकरण से गद्दारी करते हुए अपनी फौजों को वापस पीछे हटा लिया और कुछ शासकों ने टोला बदल लिया ….

सैन्य शक्ति क्षीण होने के बाद अब लूणकरण के सामने ढोंसी की रणभूमि से पीछे हटने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था ….

किन्तु ….

शूरवीर लूणकरण ने रणभूमि से पीछे हटने के बजाय युद्ध करने का निश्चय किया और शत्रु खेमे के 21 योद्धाओं को गाजर मूली की तरह चीरते हुए युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त की ….

इसी कारण राव लूणकरण को राजपूताने का आखिरी सांस तक युद्ध लड़ने वाला योद्धा कहा जाता है ….

दानशीलता एवं शूरवीरता के कारण राव लूणकरण को राजपूताने के आधुनिक युग का कर्ण भी कहा जाता है ….

राव लूणकरण 28 जून 1526 को ढोंसी की रणभूमि में खेत हुए थे …. कुछ जगह यह तिथि 31 मार्च 1526 भी लिखी हुई है ….

संदर्भ ….

(1) पुस्तक ;- बीकानेर राज्य का इतिहास ….
लेखक ;- महोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ….

(2) पुस्तक ;- राजस्थान का इतिहास ….
लेखक ;- पंडित गोपीनाथ शर्मा ….

(3) पुस्तक ;- राव जैतसी रो छंद ….
लेखक ;- बिठु सूजा ….
दरबारी/विदूषक ;- राव जैतसी शासक बीकानेर ….

(4) पुस्तक ;- कर्मचंद्रवंशौतकीर्तनकं-काव्यम: ….
लेखक ;- जयसोम ….
दरबारी/विदूषक ;- रावB कल्याणमल शासक बीकानेर ….

लूणकरण झील व लूणकरणसर कस्बे (वर्तमान बीकानेर की एक तहसील) की स्थापना राव लूणकरण द्वारा की गई है !