मातृ दिवस पर रचित मनमोहक कविता “चंद्र कौमुदी”

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चंद्र कौमुदी

अर्श के सोहबत में वो चंद्र कौमुदी तुम ही हो,
जो पलकों के भीतर आ समाई है।।
मुख पे अनुपम गरूर सी छाने लगी थी,
ये पंखी सौभाग्य का पैगाम लायी है।।
हाँ, मैने माना कि तारीफ़ मुमकिन नहीं,
कौमुदी जैसी कोई भी तसव्वुर नहीं।।
कौमुदी जैसे कोई मयंक राग है,
कौमुदी जैसे जीवन का आधार है।।
कौमुदी जैसे कोई है, चहरे का नूर,
कौमुदी जैसी कोई ना चश्म-ए-बदूर।।
कौमुदी जैसे कोई अनुपम ताल है,
कौमुदी में बसा रम्य महताब है।।
कौमुदी है मेरे जीने कि एक ही वज़ह,
कौमुदी मेरे सुख का सही रास्ता,
कौमुदी पाकीज़ा, कौमुदी है हसीन
चान्दनी चान्दनी- सुरमई सुरमई
हाँ मैने माना की तारीफ़ मुमकिन नहीं
कौमुदी मे बसी, मेरी चंद्र जन्ननी ।।

लेखक: हर्षिता शर्मा (जयपुर)