कब तक वैक्सीन कोरोना का ?

0
25

गीतांजलि पोस्ट… लेखिका- दिप्ती डांगे (नई दिल्ली)

कोरोना एक वायरस जो मानव के बाल की तुलना में 900 गुना छोटा है।लेकिन पूरी दुनिया को अपनी चपेट मे लेकर एक महामारी बन चुका है। इस महामारी की शुरुआत सर्दी खाँसी से होती है जो आगे चल कर एक विकराल रूप ले लेती है और रोगी के स्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करती है। इतनी बुरी तरह की कई बार रोगी की मृत्यु हो जाती है।
आज कोई भी देश इस बीमारी से अछूता नही है। करोड़ो लोग इसके शिकार हो चुके है और लाखों काल के गाल मे चले गए है। और ये सिलसिला रुकने का नाम नही ले रहा। डॉक्टर्स और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की माने तो ये वायरस अपना रूप और प्रकृति बदलता रहता है। आज पूरी दुनिया कोविद-19 के डर से साये मे जी रही है।

पूरी दुनिया को बदहाल करने वाला Covid-19 को हराने के लिए 100 से ज्यादा देश एक दूसरे के साथ मिलकर 170 से ज्यादा वैक्सीन पर काम कर रहे है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिर भी तैयार होने वाली वैक्‍सीन को और लोगों तक पहुंचने में समय लगेगा, दरअसल, किसी भी वैक्‍सीन के किसी भी वैक्सीन को लैब से क्लीनिक तक पहुंचने में एक लंबी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है. स्टैंडर्ड प्रोसीजर (procedure) के मुताबिक इसके कई चरण होते हैं।

स्टेज 1: रिसर्च एंड डेवपलमेंट

इस चरण में दो से चार साल का समय लगता है

स्टेज 2: प्री क्लिनिकल

1 चरण (रिसर्च और डेवलपमेंट) के पूरे होने के बाद, सबसे पहले वैक्सीन का इस्तेमाल चूहों या बंदरों पर किया जाता है ताकि ये समझा जा सके कि इस वैक्सीन को देने के बाद शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली कैसी प्रतिक्रिया देती है। अगर कोई प्रतिक्रिया नही होती तो रिसर्च
दोबारा स्टेज 1 पर चली जाती है जिससे प्रक्रिया बहुत लंबी हो जाती है.

स्टेज 3: क्लिनिकल ट्रायल (ह्यूमन ट्रायल)

यह वैक्सीन के विकास में सबसे संवेदनशील और अहम स्टेज होती है क्योंकि इसमें क्षमता को इंसानों पर टेस्ट किया जाता है. इस के 3 फेज होते है।

फेज 1: सेफ्टी ट्रायल ( Safety Trial)- प्रीक्लीनिकल टेस्टिंग के बाद वैक्सीन की डोज़ कुछ इंसानों को दी जाती है ताकि वैक्सीन की सुरक्षा और मात्रा का निर्धारण किया जा सके।इसमें तीन महीने तक का समय लग जाता है।

फेज 2: एक्सपैंडेड ट्रायल (Expended Trial )- इस फ़ेज़ में साइनटिस्ट अलग-अलग समूहों के लोगों का चयन करते हैं. जैसे बच्चे, बुज़ुर्ग आदि. ऐसे क़रीब सौ लोगों का चयन किया जाता है और उन पर वैक्सीन का ट्रायल कर ये समझने की कोशिश की जाती है वैक्सीन अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों पर कैसा प्रभाव दिखाती है. इसके बाद ये सुनिश्चित किया जाता है कि वैक्सीन कितनी सुरक्षित है ।वैक्सीन की आम और विपरीत रिएक्शन पैदा करने की क्षमता का भी विश्लेषण किया जाता है और शरीर के इम्यून सिस्टम को कैसे उत्प्रेरित करती है।इसमें औसत 6 से 8 महीने का समय लग सकता है। कई कैंडिडेट जो कुछ दिन पहले फेज 2 में थे, वे अब क्लिनिकल ट्रायल फेज 3 में पहुंच गए हैं.

फेज 3: एफिशिएंसी ट्रायल (Efficiency ट्रायल)- इस चरण में वैक्सीन की क्षमता, गुण या प्रभावोत्पादकता को परखा जाता है. इसमें वैक्सीन हज़ारों लोगों पर प्रयोग में लाई जाती है और एक निश्चित समय तक इंतज़ार कर ये देखा जाता है इनमें से कितने लोग रोग से पीड़ित हुए और कितने ठीक. इस ट्रायल में शामिल लोगों में कुछ ‘प्लेसीबो वालंटियर’ भी होते हैं. ये एक महत्वपूर्ण चरण होता है क्योंकि प्लेसीबो वालंटियर वो होते हैं जिन्हें बताया नहीं जाता है कि उन्हें वैक्सीन दी गई है या सैलाइन वाटर. इस ट्रायल से काफ़ी हद तक ये सुनिश्चित हो जात है कि ये वैक्सीन उस रोग से लड़ने में वाकई कितनी कारगर है.
हजारों लोगों पर वैक्सीन का आकलन किया जाता है और यह देखने की कोशिश होती है कि वैक्सीन बड़ी आबादी में कैसे काम करती है. यह दोबारा 6 से 8 महीने का समय ले सकती है.

स्टेज 4: रेगुलेटरी रिव्यू

इंसानी ट्रायल के कई स्टेज और फेज में कामयाब रहने के बाद, सरकार के औषधि नियामक प्राधिकरण की। प्राधिकरण ट्रायल के नतीजों का गहन अध्ययन करता है और ये तय करता है इस वैक्सीन को निर्माण की अनुमति दी जाए या नहीं. हालांकि इतिहास पर नज़र डालें तो कुछ देशों में बढ़ती महामारी पर काबू पाने के लिए आधिकारिक अप्रूवल से पहले भी वैक्सीन को मान्यता दे दी गई.

स्टेज 5: मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी कंट्रोल

इस स्टेज में वैक्सीन का उत्पादन करने वाली कंपनी के बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय संसाधन की जरूरत होती है जिससे वैक्सीन के निर्माण की प्रक्रिया को बड़े स्तर पर शुरू किया जा सके।

यूएस, यूके, रूस और चीन के साथ-साथ भारत के भी दो वैक्सीन इस रेस में शामिल हैं। यह तय है कि कोरोनावायरस का वैक्सीन इतिहास में सबसे तेजी से डेवलप हो रहा वैक्सीन है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 23 वैक्सीन मानव परीक्षण के दौर में चल रहे हैं, जिसमें से कुछ पहले और दूसरे चरण में हैं तो कुछ तीसरे यानी अंतिम चरण में। पांच वैक्सीन अपने आखिरी चरण के ट्रायल में हैं।जिस तरह से कार्ये युद्ध स्तर पर चल रहा है तो लगता है कि इस साल के अंत या 2021 के शुरू मे कोरोना का वैक्सीन मिल जाएगी।

1.मॉडर्ना
मैसाचुसेट्स (अमेरिका) स्थित बायोटेक कंपनी
की ड्रग कंपनी मॉडर्ना की वैक्सीन mRNA-1273 का फिलहाल तीसरे यानी अंतिम चरण का ट्रायल चल रहा है, जिसमें 30 हजार लोगों को शामिल किया गया है। इस ट्रायल को सितंबर में पूरा कर लेने का लक्ष्य रखा गया है। कंपनी ने इस साल दिसंबर तक वैक्सीन को बाजार में उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। माना जा रहा है कि इसकी कीमत 1800 से 2300 रुपये के बीच हो सकती है।

2.ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका
ऑक्सफोर्ड ने  ChAdOx1 nCoV-19 वैक्सीन के लिए एस्ट्राजेनेका के साथ साझेदारी की है।भारत में इसके उत्पादन के लिए एस्ट्राजेनेका के साथ सीरम इंस्टीट्यूट ने साझेदारी की है। ये वैक्सीन अपने अंतिम चरण के ट्रायल में है।माना जा रहा है कि दिसंबर तक यह बाजार में आ जाएगी।इस वैक्सीन की कीमत 4 डॉलर (297 रूपए) होगी।

3.फाइजर और जर्मन बायोटेक कंपनी
न्यूयॉर्क स्थित फाइजर (Pfizer) जर्मन बायोटेक कंपनी  BioNTech के साथ वैक्सीन पर काम कर रही है. ये वैक्सीन भी mRNA प्लेटफॉर्म पर आधारित है. ये जर्मन कंपनी पहले भी कैंसर की प्रायोगिक वैक्सीन बना चुकी है. फाइजर ने अमेरिकी सरकार के साथ लगभग 195 करोड़ वैक्सीन की आपूर्ति करने का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है।अगर सबकुछ ठीक रहा तो इस वैक्सीन को अक्टूबर 2020 तक रेगुलेटरी मंजूरी मिल जाएगी. इस वैक्सीन की कीमत 19.50 डॉलर (1454 रूपए) तक रखी गई है।

4.सिनोफार्म
चीन की फार्मा कंपनी सिनोफार्म ने हाल ही में घोषणा की है कि इस साल के अंत तक वो कोरोना की वैक्सीन बना लेगी। फिलहाल इसके तीसरे चरण का ट्रायल संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में चल रहा है और इसके दिसंबर तक बाजार में आने की उम्मीद है। बताया जा रहा है कि इस वैक्सीन की दो खुराक की कीमत 1000 युआन यानी करीब 10,700 रुपये होगी।

5.कैन्सिनो बायोलॉजिक्स इंक
चीनी कंपनी कैन्सिनो बायोलॉजिक्स इंक (CanSino Biologics Inc) की वैक्सीन Ad5-nCoV को पेटेंट मिल गया है। साथ ही बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के सहयोग से बनाई गई इस वैक्सीन को चीन में सैन्य इस्तेमाल की अनुमति भी मिल चुकी है। वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि इस साल के अंत तक यह वैक्सीन बाजार में आ सकती है। हालांकि इसकी कीमत का अभी खुलासा नहीं किया गया है।

रूस की वैक्सीन ‘स्पूतनिक-वी’
रूस ने तो 11 अगस्त को ही वैक्सीन ‘स्पूतनिक-वी’ को लॉन्च करने का दावा कर दिया था। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी इसे सुरक्षित और प्रभावी बताया था। हालांकि इसके तीसरे यानी अंतिम चरण का ट्रायल अभी नहीं हुआ है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, गमलेया इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित इस वैक्सीन का ट्रायल 40,000 स्वयंसेवकों पर किया जाएगा, जिसके लिए सरकार से अनुमति मिल चुकी है। गमलेया रिसर्च सेंटर के निदेशक अलेक्जेंडर गिंट्सबर्ग ने संकेत दिया है कि अगले महीने यानी सितंबर में बड़े पैमाने पर देश में टीकाकरण अभियान भी चलाया जाएगा। इस वैक्सीन की कीमत क्या होगी, इस बारे में अभी कोई भी जानकारी साझा नहीं की गई है।
भारत का योगदान
ये पहली बार है कि दुनिया की नज़र भारत पर है क्योंकि भारत उन चंद देशों में शामिल है जो कोरोना वैक्सीन के ट्रायल में आगे चल रहा है।
भारत में कुल तीन कोरोना वैक्‍सीन का ट्रायल चल रहा है।

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (SII)
SII ने ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी-अस्‍त्राजेनेका की वैक्‍सीन ‘कोविशील्‍ड’ का फेज 2 और 3 ट्रायल शुरू कर दिया है। देश के 17 शहरों में 18 साल से ज्‍यादा उम्र वाले करीब 1,600 लोगों पर इस वैक्‍सीन का ट्रायल हो रहा है। पुणे की कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (SII) इस वैक्‍सीन के प्रॉडक्‍शन में अस्‍त्राजेनेका की पार्टनर है।

भारत में बनी Covaxin और Zycov-D अभी फेज 1 और 2 के ट्रायल में हैं। दोनों वैक्‍सीन का एक हजार से लेकर 1,100 लोगों पर ट्रायल हो रहा है।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने ट्वीट किया, ‘मैंने उम्मीद जताई है कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत इस साल के आखिर तक कोरोना वायरस का टीका हासिल कर लेगा।’
भारतीय सरकार कोरोना वैक्सीन को समर्पित एक विशेष वेबसाइट भी ला रही है, जिस पर कोरोना वैक्सीन से जुड़े सारे सवालों का जवाब मिलेगा. इस पोर्टल पर न सिर्फ भारत में बन रही कोरोना वैक्सीन की जानकारी होगी, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तत्वाधान में दुनिया भर में बन रही कोरोना वैक्सीन की जानकारी भी होगी।

दुनियाभर के वैज्ञानिक, शोधकर्ता, वैक्‍सीन निर्माता कंपनियां एक दूसरे को हरसंभव सहयोग करते हुए वैक्सीन तैयार करने की कोशिश कर रही सरकारें भी उनको मंजूरी फास्‍ट-ट्रैक अंदाज में दे रही हैं। जिससे कोरोना वायरस से यथा संभव निपटा जा सके।पर अभी भी अनिश्चित्ता बनी हुई है।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, HIV की वैक्सीन पर तीन दशकों से ज्यादा समय से काम चल रहा है और यह अभी भी क्लिनिकल ट्रायल के तीसरे चरण में है।कुछ वैक्सीन जो तेजी से तैयार हुई, उनमें भी कई साल लगे।उदाहरण के लिए, mumps के लिए वैक्सीन को दुनिया की सबसे तेजी से विकसित हुई वैक्सीन में से एक माना जाता है।इसे 1960 के दशक में चार साल के क्लिनिकल ट्रायल के बाद मंजूरी मिली थी।अगर इस साल कोरोना का वैक्सीन आ जाता है तो ये एक इतिहास मे सबसे तेजी से विकसित की गई वैक्सीन होगी।पर क्या वैक्सीन आने से कोरोना पूरी तरह खत्म हो जाएगा?क्या हमारी दिनचर्या पहले जैसे हो जाएगी? पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि जिंदगी फिर पहले जैसी हो जाएगी और कोरोना का डर खत्म हो जाएगा।वैक्सीन के आने के बाद भी कोरोना से बचाव की शत प्रतिशत गारंटी नहीं होगी।ये वैक्सीन सिर्फ बीमारी की गंभीरता को कम कर सकेगी। इसलिए वैक्सीन आने के बाद भी हमें मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन करना होगा। इसलिए जितना भी हो सके घर पर रहे, मास्क पहले, स्वच्छता का ध्यान रखे, बाहर जाए तो मास्क पहनकर सोशल डिस्टेंसिंग आ ध्यान रखे।