कोरोना : जयेन्द्र त्रिपाठी की कविता

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छंदमुक्त कविता “वेद वाक्य”
– जयेन्द्र त्रिपाठी
(13 पुस्तकों के लेखक / संपादक)

“कोरोना” से डरो ना
क्या डरना ?
जब अंत में है मरना
हाँ जीओ, ख़ूब जीओ
जी भरकर जीओ
मन भर जीओ
डरो तो स्वयं से
ईश्वर से
कुकर्म से
और किसी से
क्या डरना ?
क्यों डरना ?
वैसे भी
वेद वाक्य सत्य
यद् द्रष्टम्
तद नष्टम्
फिर व्यर्थ में
उहापोह क्यों ?
हाँ डरो
डरो गंदकी से
डरो सटने से
डरो भीड़ से
डरो भ्रष्टाचार से
डरो रिश्वत से
डरो स्वैराचार से
डरो स्वच्छंदता से
कोरोना से डरोना

जयेन्द्र त्रिपाठी रिटायर्ड शिक्षक हैं । जिन्होंने अपनी ज़िंदगी भर की कमाई लगाकर ग़रीब बच्चों के लिए अहमदाबाद में एक लाइब्रेरी बनाई है । जहाँ प्रेपेरेशन कर रहे विद्यार्थियों को वो मुफ्त क़िताबें प्रोवाइड करते हैं । फिर चाहे बार काउन्सिल की एग्जाम हो या एन्ट्रेंस टेस्ट या पुराना साहित्य, यहाँ लगभग हर ज़रूरत मंद को मदद मिल जाती है । यहाँ तक़रीबन 1 करोड़ की किताबें उपलब्ध हैं । जयेन्द्र स्वयं 13 से अधिक पुस्तकों के लेखक एवं संपादक हैं । उन्हें दर्ज़नों बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं । वे तकरीबन सौ से भी अधिक अख़बारों में वरिष्ठ कॉलमनिस्ट भी हैं । इनके हज़ारों आर्टिकल्स तथा कविताएँ हमें हमारी स्वर्णिम संस्कृति की ओर ले जाती हैं । एंड्रॉइड की दुनिया में भले ही लोग पोर्नोग्राफी या न्यूडिटी की ओर बढ़ रहे हैं ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भारतीयता की व्याख्याएँ समझाते हैं ।