जानिए मौनी अमावस्या की विशेषता हमारे साथ

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गीतांजलि पोस्ट………. (श्रेयांस ) जयपुर:- आज है मौनी अमावस्या
संवत् २०७७ माघ मास कृष्ण अमावस्या गुरुवार 11 फरवरी 2021

पं. अनन्त पाठक – माघ मास की अमावस्या जिसे मौनी अमावस्या कहते हैं। यह योग पर आधारित महाव्रत है। मौनी अमावस्या के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा गोचरवश मकर राशि में आते हैं इसलिए यह संपूर्ण शक्ति से भरा हुआ पावन दिन बन जाता है।
मकर राशि, सूर्य तथा चन्द्रमा के योग के कारण ही इस अमावस्या का अत्यधिक महत्व है। इस मास को भी कार्तिक के समान पुण्य मास कहा गया है। गंगा तट पर इस कारण भक्त जन एक मास तक कुटी बनाकर गंगा सेवन करते हैं।जिसे कल्प वास भी कहते हैं ।

शास्त्रों के अनुसार मौनी अमावस्या पर गंगा नदी में स्नान करने से दैहिक (शारीरिक), भौतिक (अनजाने में किया गया पाप), दैविक (ग्रहों, गोचरों का दुर्योग) तीनों प्रकार के मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं। इस दिन स्वर्ग लोक के सारे देवी-देवता गंगा में वास करते हैं, जो पापों से मुक्ति देते हैं।
शिव महापुराण में मौनी अमावस्या का महत्व बताते हुए स्वंय भगवान शिव बताते हैं जो मनुष्य इस दिन गंगा, यमुना आदि नदियों में स्नान करके सच्चे मन से दान करता है उस पर समस्त ग्रह-नक्षत्रों की कृपा बनी रहती है. इस दिन गंगा स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान फल की प्राप्ति होती है।

पुराणों के अनुसार जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए उससमय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए खींचा तानी शुरू हो गयी इससेअमृत की कुछ बूंदें छलक कर प्रयाग, हरिद्वार ,नासिक और उज्जैन में जा गिरा। यही कारण है कि यहां कि नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है। यह तिथि अगर सोमवार के दिन पड़ता है तब इसका महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। अगर सोमवार हो और साथ ही महाकुम्भ लगा हो तब इसका महत्व अनन्त गुणा हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है सत युगमें जो पुण्य तप से मिलता है द्वापर में हरि भक्ति से त्रेता में ज्ञानसे कलियुग में दान से लेकिन माघ मास में संगम स्नान हर युग में अन्नंत पुण्यदायी होगा।

पं.अनन्त पाठक — जो तीर्थों नदियों मे स्नान नहीं कर सकते अपने घर पर किसी पात्र मे जल रख कर निम्न मंत्र हे अभिमंत्र कर के मौन व्रत रखते हुए स्नान करें।
–मन्त्र-
*अयोध्या, मथुरा, माया, काशी कांचीर् अवन्तिका, पुरी, द्वारावतीश्चैव: सप्तैता मोक्षदायिका।।
* ।।गंगे च यमुनेश्चैव गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी जलेस्मिनेसंनिधि कुरू।
इस दिन मौन व्रत रखने का भी विधान है। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। पुराणों के अनुसार मौनी अमावस्या यानी भगवान ब्रह्मा के स्वयंभू पुत्र ऋषि मनु। इन्होंने आजीवन मौन रहकर तपस्या की थी इसीलिए इस तिथि को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इसलिए इस व्रत को धारण करके मौन रहने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है और वह भगवान का प्रिय बन जाता है। इस व्रत का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को वश में रखना चाहिए।
अपनी वाणी को संयत करना ही मौन व्रत है। इस अर्थ में देखा जाए तो यह आत्मसंयम और आत्म नियमन का व्रत है। कई लोग इस दिन से मौन व्रत रखने का प्रण करते हैं। दिन, सप्ताह, मास और वर्ष के अनुरूप लोग अलग-अलग अवधि का मौन संकल्प धारण करते हैं। मौन से आत्मबल मिलता है। कबीरदास जी कहते हैं- ‘वाद विवाद विष घना, बोले बहुत उपाध। मौन रहे सबकी सहे, सुमिरै नाम अगाध।’
ग्राम्य जीवन में तो कहा गया है – ‘एक चुप्प सौ को हरावै।’ मौनी अमावस्या को स्नानादि से निवृत्त होकर मौन व्रत रख एकांत स्थल पर जाप आदि करना चाहिए। इससे चित्त की शुद्धि होती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है।

इस तिथि को भगवान विष्णु और शिव जी दोनों की पूजा का विधान है। वास्तव में शिव और विष्णु दोनों एक ही हैं जो भक्तो के कल्याण हेतु दो स्वरूप धारण करते हैं इस बात का उल्लेख स्वयं भगवान ने किया है। इस दिन पीपल में आर्घ्य देकर परिक्रमा करें और दीप दान दें।मौनी अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने से पितरों को शांति भी मिलती है।यह अमावस्या चन्द्र तथा राहु प्रधान होती है इसलिए जिस व्यक्ति की पत्रिका में इन ग्रहों से संबंधित परेशानियां हों, इस दिन उपाय करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है।
मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति स्नान तथा जप आदि के बाद हवन, दान आदि कर सकता है।

दान का विशेष महत्व :- मौनी अमावस्या के दिन तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते दान करने का विशेष महत्व है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा नीच का है, उन्हें दूध, चावल, खीर, मिश्री, बताशा दान करने में विशेष फल की प्राप्ति होगी।मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार दान, पुण्य तथा जाप अवश्य करना चाहिए।

मौनी अमावस्या की कथा :-कांचीपुरी में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। पुत्री का नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने सातों पुत्रों को विवाह करके बेटी के लिए वर खोजने अपने सबसे बड़े पुत्र को भेजा। उसी दौरान किसी पण्डित ने पुत्री की जन्मकुण्डली देखी और बताया-‘सप्तपदी होते-होते यह कन्या विधवा हो जाएगी।’ तब उस ब्राह्मण ने पण्डित से पूछा- ‘पुत्री के इस वैधव्य दोष का निवारण कैसे होगा?’ पंडित ने बताया-‘ सोमा का पूजन करने से वैधव्य दोष दूर होगा।’ फिर सोमा का परिचय देते हुए उसने बताया-‘ वह एक धोबिन है। उसका निवास स्थान सिंहल द्वीप है। उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करो और गुणवती के विवाह से पूर्व उसे यहाँ बुला लो।’ तब देवस्वामी का सबसे छोटा लड़का बहन को अपने साथ लेकर सिंहल द्वीप जाने के लिए सागर तट पर चला गया। सागर पार करने की चिंता में दोनों एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। उस पेड़ पर एक घोंसले में गिद्ध का परिवार रहता था। उस समय घोंसले में सिर्फ़ गिद्ध के बच्चे थे। गिद्ध के बच्चे भाई-बहन के क्रिया-कलापों को देख रहे थे। सायंकाल के समय उन बच्चों (गिद्ध के बच्चों) की मां आई तो उन्होंने भोजन नहीं किया। वे मां से बोले- ‘नीचे दो प्राणी सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हैं। जब तक वे कुछ नहीं खा लेते, तब तक हम भी कुछ नहीं खाएंगे।’ तब दया और ममता के वशीभूत गिद्ध माता उनके पास आई और बोली- ‘मैंने आपकी इच्छाओं को जान लिया है। इस वन में जो भी फल-फूल कंद-मूल मिलेगा, मैं ले आती हूं। आप भोजन कर लीजिए। मैं प्रात:काल आपको सागर पार कराकर सिंहल द्वीप की सीमा के पास पहुंचा दूंगी।’ और वे दोनों भाई-बहन माता की सहायता से सोमा के यहाँ जा पहुंचे। वे नित्य प्रात: उठकर सोमा का घर झाड़कर लीप देते थे। एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा-‘हमारे घर कौन बुहारता है, कौन लीपता-पोतता है?’ सबने कहा-‘हमारे सिवाय और कौन बाहर से इस काम को करने आएगा?’ किंतु सोमा को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन उसने रहस्य जानना चाहा। वह सारी रात जागी और सबकुछ प्रत्यक्ष देखकर जान गई। सोमा का उन बहन-भाई से वार्तालाप हुआ। भाई ने सोमा को बहन संबंधी सारी बात बता दी। सोमा ने उनकी श्रम-साधना तथा सेवा से प्रसन्न होकर उचित समय पर उनके घर पहुंचने का वचन देकर कन्या के वैधव्य दोष निवारण का आश्वासन दे दिया। मगर भाई ने उससे अपने साथ चलने का आग्रह किया। आग्रह करने पर सोमा उनके साथ चल दी। चलते समय सोमा ने बहुओं से कहा-‘मेरी अनुपस्थिति में यदि किसी का देहान्त हो जाए तो उसके शरीर को नष्ट मत करना। मेरा इन्तजार करना।’ और फिर सोमा बहन-भाई के साथ कांचीपुरी पहुंच गई। दूसरे दिन गुणवती के विवाह का कार्यक्रम तय हो गया। सप्तपदी होते ही उसका पति मर गया। सोमा ने तुरन्त अपने संचित पुण्यों का फल गुणवती को प्रदान कर दिया। तुरन्त ही उसका पति जीवित हो उठा। सोमा उन्हें आशीर्वाद देकर अपने घर चली गई। उधर गुणवती को पुण्य-फल देने से सोमा के पुत्र, जामाता तथा पति की मृत्यु हो गई। सोमा ने पुण्य फल संचित करने के लिए मार्ग में अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की छाया में विष्णुजी का पूजन करके 108 परिक्रमाएं कीं। इसके पूर्ण होने पर उसके परिवार के मृतक जन जीवित हो उठे। निष्काम भाव से सेवा का फल मधुर होता है, इस व्रत का यही लक्ष्य है।